चलो चलें Poetry (page 27)

रश्क-ए-महताब जहाँ-ताब था हर क़र्या-ए-जाँ

सादिक़ नसीम

जो लब पे न लाऊँ वही शे'रों में कहूँ मैं

सादिक़ नसीम

अपनी आँखों से तो दरिया भी सराब-आसा मिले

सादिक़ नसीम

एक पुरानी नज़्म

सादिक़

दिखाएगी असर दिल की पुकार आहिस्ता आहिस्ता

सदा अम्बालवी

इक-आध बार तो जाँ वारनी ही पड़ती है

साबिर ज़फ़र

सितारे सो गए तो आसमाँ कैसा लगेगा

साबिर ज़फ़र

शाम से पहले तिरी शाम न होने दूँगा

साबिर ज़फ़र

पड़ा न फ़र्क़ कोई पैरहन बदल के भी

साबिर ज़फ़र

निगाह करने में लगता है क्या ज़माना कोई

साबिर ज़फ़र

कोई तो तर्क-ए-मरासिम पे वास्ता रह जाए

साबिर ज़फ़र

हर एक मरहला-ए-दर्द से गुज़र भी गया

साबिर ज़फ़र

ये महर ओ मह बे-चराग़ ऐसे कि राख बन कर बिखर रहे हैं

साबिर वसीम

इक शोर समेटो जीवन भर और चुप दरिया में उतर जाओ

साबिर वसीम

अख़ीर-ए-शब सर्द राख चूल्हे की झाड़ लाएँ

साबिर

दुरुस्त है कि ये दिन राएगाँ नहीं गुज़रे

सबिहा सबा, न्यूयार्क

बे-ख़याली में तख़्लीक़

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

किस को बताते किस से छुपाते सुराग़-ए-दिल

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

क्यूँ ढूँढती रहती हूँ उसे सारे जहाँ में

सबा नुसरत

पूरी मिरे जुनूँ की ज़रूरत न कर सके

सबा अकबराबादी

पूछें तिरे ज़ुल्म का सबब हम

सबा अकबराबादी

इस रंग में अपने दिल-ए-नादाँ से गिला है

सबा अकबराबादी

है जो दरवेश वो सुल्ताँ है ये मा'लूम हुआ

सबा अकबराबादी

ये सिलसिला-ए-शाम-ओ-सहर यूँही नहीं है

रूही कंजाही

तुझ पे हर हाल में मरना चाहूँ

रूही कंजाही

मोजज़ा कोई दिखाऊँ भी तो क्या

रूही कंजाही

ताख़ीर आ पड़ी जो बदन के ज़ुहूर में

रियाज़ लतीफ़

हिसार के सभी निज़ाम गर्द गर्द हो गए

रियाज़ लतीफ़

ये काफ़िर बुत जिन्हें दावा है दुनिया में ख़ुदाई का

रियाज़ ख़ैराबादी

परा बाँधे सफ़-ए-मिज़्गाँ खड़ी है

रियाज़ ख़ैराबादी

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