चलो चलें Poetry (page 29)

जाने क्या है जिसे देखो वही दिल-गीर लगे

राज़ी अख्तर शौक़

इन्ही गलियों में इक ऐसी गली है

राज़ी अख्तर शौक़

हलाक-ए-कश्मकश-ए-राएगाँ बहुत से हैं

राज़ी अख्तर शौक़

घर की रौनक़

रज़ा नक़वी वाही

जो ख़ुद न अपने इरादे से बद-गुमाँ होता

रज़ा लखनवी

हर एक घर का दरीचा खुला है मेरे लिए

रज़ा हमदानी

उस घड़ी कुछ थे और अब कुछ हो

रज़ा अज़ीमाबादी

मुझ को जो कहते हो म्याँ तुम हो कहाँ तुम हो कहाँ

रज़ा अज़ीमाबादी

जो तिरे दर पे मेरी जाँ आया

रज़ा अज़ीमाबादी

इश्क़ के जाँ-निसार जीते हैं

रज़ा अज़ीमाबादी

अब्र के बिन देखे हरगिज़ ख़ुश दिल-ए-मस्ताँ न हो

रज़ा अज़ीमाबादी

वो निकहत-ए-गेसू फिर ऐ हम-नफ़साँ आई

रविश सिद्दीक़ी

वो बर्क़-ए-नाज़ गुरेज़ाँ नहीं तो कुछ भी नहीं

रविश सिद्दीक़ी

रंग पर जब वो बज़्म-ए-नाज़ आई

रविश सिद्दीक़ी

निकहत-ए-ज़ुल्फ़ को हम-रिश्ता-ए-जाँ कहता हूँ

रविश सिद्दीक़ी

क्या देखते हैं आप झिजक कर शराब में

रौनक़ टोंकवी

रात की सारी हक़ीक़त दिन में उर्यां हो गई

रौनक़ रज़ा

न जाने कौन सा मंज़र नज़र से गुज़रा था

रौनक़ रज़ा

सिलसिले ये कैसे हैं टूट कर नहीं मिलते

रउफ़ ख़लिश

कोई भी ज़ोर ख़रीदार पर नहीं चलता

रऊफ़ ख़ैर

आँखों प अभी तोहमत-ए-बीनाई कहाँ है

रऊफ़ ख़ैर

गर्म हर लम्हा लहू जिस्म के अंदर रखना

रासिख़ इरफ़ानी

शुऊर-ए-ज़ीस्त सही ए'तिबार करना भी

रशक खलीली

न जाने कब बसर हुए न जाने कब गुज़र गए

रशक खलीली

प्यारा सा ख़्वाब नींद को छू कर गुज़र गया

राशिद जमाल फ़ारूक़ी

मौसम के मुताबिक़ कोई सामाँ भी नहीं है

राशिद जमाल फ़ारूक़ी

इस तग-ओ-दौ ने आख़िरश मुझ को निढाल कर दिया

राशिद जमाल फ़ारूक़ी

तुम अपनी आँखों को बंद कर लो

राशिद आज़र

बेबसी

राशिद आज़र

ये बे-नवाई हमारी सौदा-ए-सर है घर में बसा दिया है

राशिद आज़र

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