चलो चलें Poetry (page 51)

ख़बर सुनेगा मिरी मौत की तो ख़ुश होगा

बाक़र मेहदी

दुश्मन-ए-जाँ कोई बना ही नहीं

बाक़र मेहदी

लब-ए-जाँ-बख़्श के मीठे का तेरे जो मज़ा पाया

बाक़र आगाह वेलोरी

सब्र-ओ-ज़ब्त की जानाँ दास्ताँ तो मैं भी हूँ दास्ताँ तो तुम भी हो

बक़ा बलूच

तर्सील

बलराज कोमल

सर-ए-राहगुज़र एक मंज़र

बलराज कोमल

मैं, एक और मैं

बलराज कोमल

इत्तिफ़ाक़

बलराज कोमल

दीदा-ए-तर

बलराज कोमल

समाअ'त के लिए इक इम्तिहाँ है

बकुल देव

दिल से बे-सूद और जाँ से ख़राब

बकुल देव

हुसूल-ए-मंज़िल-ए-जाँ का हुनर नहीं आया

बख़्श लाइलपूरी

तिश्नगी-ए-लब पे हम अक्स-ए-आब लिक्खेंगे

बख़्श लाइलपूरी

पड़े हैं राह में जो लोग बे-सबब कब से

बख़्श लाइलपूरी

हुसूल-ए-मंज़िल-ए-जाँ का हुनर नहीं आया

बख़्श लाइलपूरी

रिश्ता-ए-उल्फ़त रग-ए-जाँ में बुतों का पड़ गया

बहराम जी

कब तसव्वुर यार-ए-गुल-रुख़्सार का फ़े'अल-ए-अबस

बहराम जी

ये क़िस्सा वो नहीं तुम जिस को क़िस्सा-ख़्वाँ से सुनो

ज़फ़र

क्यूँकर न ख़ाकसार रहें अहल-ए-कीं से दूर

ज़फ़र

काफ़िर तुझे अल्लाह ने सूरत तो परी दी

ज़फ़र

जब कि पहलू में हमारे बुत-ए-ख़ुद-काम न हो

ज़फ़र

जब कभी दरिया में होते साया-अफ़गन आप हैं

ज़फ़र

होते होते चश्म से आज अश्क-बारी रह गई

ज़फ़र

ज़रूरतों की हमाहमी में जो राह चलते भी टोकती है वो शाइ'री है

बद्र-ए-आलम ख़लिश

कहीं सुब्ह-ओ-शाम के दरमियाँ कहीं माह-ओ-साल के दरमियाँ

बद्र-ए-आलम ख़लिश

गुम हुए जाते हैं धड़कन के निशाँ हम-नफ़सो

बद्र-ए-आलम ख़लिश

दिल-ओ-जाँ के फ़साने क्या हुए सब

बदनाम नज़र

ग़ुबार-ए-जाँ पस-ए-दीवार-ओ-दर समेटा है

अज़रा वहीद

बे-ख़ुदा होने के डर में बे-सबब रोता रहा

अज़रा परवीन

कैसे कैसे स्वाँग रचाए हम ने दुनिया-दारी में

अज़रा नक़वी

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