जिन्न Poetry (page 13)

थी कुछ न ख़ता फिर भी पशेमान रहे हैं

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

पलकों से अपने भूले हुए ख़्वाब बाँध लें

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

रुत्बा-ए-दर्द को जब अपना हुनर पहुँचेगा

शहाब जाफ़री

अब कहाँ ले के छुपें उर्यां बदन और तन जला

शहाब जाफ़री

हम हैं और मजनूँ अज़ल से ख़ाना-पर्वर्द-ए-जुनूँ

शाह नसीर

ब'अद-ए-मजनूँ क्यूँ न हूँ मैं कार-फ़रमा-ए-जुनूँ

शाह नसीर

आ के सलासिल ऐ जुनूँ क्यूँ न क़दम ले ब'अद-ए-क़ैस

शाह नसीर

ज़ुल्फ़ छुटती तिरे रुख़ पर तो दिल अपना फिरता

शाह नसीर

शमीम-ए-ज़ुल्फ़-ए-मुअम्बर जो रू-ए-यार से लूँ

शाह नसीर

रंग मैला न हुआ जामा-ए-उर्यानी का

शाह नसीर

पामाल-ए-राह-ए-इश्क़ हैं ख़िल्क़त की खा ठोकर भी हम

शाह नसीर

न ज़िक्र-ए-आश्ना ने क़िस्सा-ए-बेगाना रखते हैं

शाह नसीर

क्यूँ न कहें बशर को हम आतिश-ओ-आब ओ ख़ाक-ओ-बाद

शाह नसीर

इस दिल को हम-कनार किया हम ने क्या किया

शाह नसीर

हुआ अश्क-ए-गुलगूँ बहार-ए-गरेबाँ

शाह नसीर

हो चुकी बाग़ में बहार अफ़सोस

शाह नसीर

देख तू यार-ए-बादा-कश! मैं ने भी काम क्या किया

शाह नसीर

दम ले ऐ कोहकन अब तेशा-ज़नी ख़ूब नहीं

शाह नसीर

चश्म में कब अश्क भर लाते हैं हम

शाह नसीर

बा'द-ए-मजनूँ क्यूँ न हूँ मैं कार-फ़रमा-ए-जुनूँ

शाह नसीर

सुब्हा से है न काम न ज़ुन्नार से ग़रज़

शाह आसिम

क्या कहूँ तुम से मैं यारो कौन हूँ

शाह आसिम

इश्क़ के अक़्लीम में चाल-ओ-चलन कुछ और है

शाह आसिम

मौसम-ए-गुल आ गया फिर दश्त-पैमाई रहे

शाग़िल क़ादरी

सदियों तुम्हारी याद में शमएँ जलाएँगे

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

रेग-ए-रवाँ पे नक़्श-ए-कफ़-ए-पा न देखना

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

क़ुर्बत-ए-हुस्न में भी दर्द के आसार मिले

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

जैसे सुब्ह को सूरज निकले शाम ढले छुप जाए है

शफ़ीक़ देहलवी

शगुफ़्ता होते ही मुरझा गई कली अफ़सोस

शाद लखनवी

लुंज वो पा-ए-तलब हूँ कहीं जा ही न सकूँ

शाद लखनवी

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