समाचार Poetry (page 19)

मिलते हो तो अब तुम भी बहुत रहते हो ख़ामोश

सरफ़राज़ ख़ालिद

होश जाता रहा दुनिया की ख़बर ही न रही

सरफ़राज़ ख़ालिद

ख़बर है मेरी रुस्वाई की

सरफ़राज़ शाहिद

दर-ए-मय-कदा है खुला हुआ सर-ए-चर्ख़ आज घटा भी है

सरदार सोज़

तेरी महफ़िल में जितने ऐ सितम-गर जाने वाले हैं

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

कोई उस से नहीं कहता कि ये क्या बेवफ़ाई है

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

हो लेने दो बारिश हम भी रो लेंगे

सदार आसिफ़

चलो बाँट लेते हैं अपनी सज़ाएँ

सरदार अंजुम

हम सोज़-ए-दिल बयाँ करें तुम से कहाँ तलक

सरस्वती सरन कैफ़

सोने वालों को क्या ख़बर ऐ हिज्र

साक़िब लखनवी

यूँ अकेला दश्त-ए-ग़ुर्बत में दिल-ए-नाकाम था

साक़िब लखनवी

मुझे ख़बर थी मिरा इंतिज़ार घर में रहा

साक़ी फ़ारुक़ी

मैं अपनी आँखों से अपना ज़वाल देखता हूँ

साक़ी फ़ारुक़ी

एक कुत्ता नज़्म

साक़ी फ़ारुक़ी

वो आग हूँ कि नहीं चैन एक आन मुझे

साक़ी फ़ारुक़ी

तुझे ख़बर है तुझे याद क्यूँ नहीं करते

साक़ी फ़ारुक़ी

मुझे ख़बर थी मिरा इंतिज़ार घर में रहा

साक़ी फ़ारुक़ी

मिरा अकेला ख़ुदा याद आ रहा है मुझे

साक़ी फ़ारुक़ी

शायद सवाब तुम को भी मिल जाए सब के साथ

संदीप कोल नादिम

वो मेरे हाल-ए-दिल से इस क़दर भी बे-ख़बर होगा

संदीप कोल नादिम

ख़ामोश धड़कनों की सदा की किसे ख़बर

संदीप कोल नादिम

भटका मुसाफ़िर

सलमान अंसारी

मय-कशी छोड़ दी तौहीन-ए-हुनर कर आया

सलमान अंसारी

मुझे ख़बर न थी इस घर में कितने कमरे हैं

सलमान अख़्तर

मैं तुझ से लाख बिछड़ कर यहाँ वहाँ जाता

सलमान अख़्तर

थी ये उम्मीद कि वो लौट के घर आएगा

सलमा शाहीन

फिर कोई महशर उठाने मेरी तन्हाई में आ

सलीम शाहिद

मौसम का ज़हर दाग़ बने क्यूँ लिबास पर

सलीम शाहिद

तुझे दुश्मनों की ख़बर न थी मुझे दोस्तों का पता नहीं

सलीम कौसर

साल की आख़िरी शब

सलीम कौसर

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