पत्र Poetry (page 2)

बोसा-ए-सब्ज़ा-ए-ख़त दे के गुनहगार किया

वज़ीर अली सबा लखनवी

उन की रफ़्तार से दिल का अजब अहवाल हुआ

वज़ीर अली सबा लखनवी

तुम हर इक रंग में ऐ यार नज़र आते हो

वज़ीर अली सबा लखनवी

ऐ सनम सब हैं तिरे हाथों से नालाँ आज-कल

वज़ीर अली सबा लखनवी

बयाँ ऐ हम-नशीं ग़म की हिकायत और हो जाती

वासिफ़ देहलवी

जैसे हो उम्र भर का असासा ग़रीब का

वसी शाह

दुख दर्द में हमेशा निकाले तुम्हारे ख़त

वसी शाह

वहीं जी उठते हैं मुर्दे ये क्या ठोकर से छूना है

वलीउल्लाह मुहिब

नहीं दुनिया में सिवा ख़ार-ओ-ख़स-ए-कूचा-ए-दोस्त

वलीउल्लाह मुहिब

अश्क-बारी का मिरी आँखों ने ये बाँधा है झाड़

वलीउल्लाह मुहिब

कहा जो मैं ने गया ख़त से हाए तेरा हुस्न

वली उज़लत

तिरा लब देख हैवाँ याद आवे

वली मोहम्मद वली

कमर उस दिलरुबा की दिलरुबा है

वली मोहम्मद वली

हुआ ज़ाहिर ख़त-ए-रू-ए-निगार आहिस्ता-आहिस्ता

वली मोहम्मद वली

देखना हर सुब्ह तुझ रुख़्सार का

वली मोहम्मद वली

अगर गुलशन तरफ़ वो नौ-ख़त-ए-रंगीं-अदा निकले

वली मोहम्मद वली

इस तरह रोज़ हम इक ख़त उसे लिख देते हैं

वाली आसी

यूँ तो हँसते हुए लड़कों को भी ग़म होता है

वाली आसी

मावरा

वहीद अख़्तर

मौत की जुस्तुजू

वहीद अख़्तर

तन्हाई मुझे देखती है

वहीद अहमद

इक समुंदर के हवाले सारे ख़त करता रहा

विलास पंडित मुसाफ़िर

इक समुंदर के हवाले सारे ख़त करता रहा

विलास पंडित मुसाफ़िर

नम आँखों में क्या कर लेगा ग़ुस्सा देखेंगे

विजय शर्मा अर्श

किस तरह भूले तिरे अल्फ़ाज़-ए-बेजा क्या करूँ

उर्मिलामाधव

परी उड़ जाएगी और राजधानी ख़त्म होगी

तौक़ीर तक़ी

अपने मंज़र से जुदा था इक दिन

तौक़ीर अब्बास

मैं ने जब जब भी तिरा नाम लिखा काग़ज़ पर

तनवीर गौहर

हम दुनिया से जब तंग आया करते हैं

तैमूर हसन

हिज्र बख़्शा कभी विसाल दिया

तैमूर हसन

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