सपना Poetry (page 13)

बे-नियाज़ नग़्मा-ए-दुनिया हूँ मैं

वलीउल्लाह वली

साक़ी हमें क़सम है तिरी चश्म-ए-मस्त की

वलीउल्लाह मुहिब

मिलती है उसे गौहर-ए-शब-ताब की मीरास

वलीउल्लाह मुहिब

दिल-ए-ख़िल्क़त-ए-ख़ुदा को सनमा जला न चंदाँ

वलीउल्लाह मुहिब

बुलबुल वो गुल है ख़्वाब में तू गा के मत जगा

वलीउल्लाह मुहिब

जाती रहीं किधर वो मोहब्बत की बानियाँ

वली उज़लत

तुझ लब की सिफ़त लाल-ए-बदख़्शाँ सूँ कहूँगा

वली मोहम्मद वली

किया मुझ इश्क़ ने ज़ालिम कूँ आब आहिस्ता आहिस्ता

वली मोहम्मद वली

सफ़र है ख़त्म मगर बे-घरी न जाएगी

वली आलम शाहीन

कुछ दिन तिरा ख़याल तिरी आरज़ू रही

वाली आसी

लहूलुहान समुंदर भी देखना है अभी

वाजिद क़ुरैशी

ज़ोहरा सुहैल शम्स ख़ुर बद्र बहा तू कौन है

वाजिद अली शाह अख़्तर

कभी लुत्फ़-ए-ज़बान-ए-ख़ुश-बयाँ थे

वाजिद अली शाह अख़्तर

जा बैठते हो ग़ैरों में ग़ैरत नहीं आती

वाजिद अली शाह अख़्तर

मोहब्बत के तआ'क़ुब में थकन से चूर होने तक

वजीह सानी

इक मोहब्बत का फ़ुसूँ था सो अभी बाक़ी है

वजीह सानी

मुद्दत हुई है मदह-ए-हसीनाँ किए हुए

वहीदुद्दीन सलीम

मुद्दत हुई है मदह-ए-हसीनाँ किए हुए

वहीदुद्दीन सलीम

किरनों से तराशा हुआ इक नूर का पैकर

वहीद अख़्तर

बिछड़े हुए ख़्वाब आ के पकड़ लेते हैं दामन

वहीद अख़्तर

परोमीथियस

वहीद अख़्तर

मावरा

वहीद अख़्तर

सहराओं में दरिया भी सफ़र भूल गया है

वहीद अख़्तर

रात भर ख़्वाब के दरिया में सवेरा देखा

वहीद अख़्तर

लिपटी हुई फिरती है नसीम उन की क़बा से

वहीद अख़्तर

जिस को माना था ख़ुदा ख़ाक का पैकर निकला

वहीद अख़्तर

कोई बस्ती कि मुझ में बस्ती है

वहीद अहमद

सुकूत-ए-शब सितारों से हवा जब बात करती है

विश्मा ख़ान विश्मा

कुछ लोग दिल की आड़ में रू-पोश हो गए

विश्मा ख़ान विश्मा

करना है कार-ए-ख़ैर तो फिर सर न देखना

विश्मा ख़ान विश्मा

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