सपना Poetry (page 82)

मैं एक रेत का पैकर था और बिखर भी गया

असलम महमूद

तू अपने शहर-ए-तरब से न पूछ हाल मिरा

असलम महमूद

न मलाल-ए-हिज्र न मुंतज़िर हैं हवा-ए-शाम-ए-विसाल के

असलम महमूद

मिज़ा पे ख़्वाब नहीं इंतिज़ार सा कुछ है

असलम महमूद

मैं एक रेत का पैकर था और बिखर भी गया

असलम महमूद

किया गर्दिशों के हवाले उसे चाक पर रख दिया

असलम महमूद

देख के अर्ज़ां लहू सुर्ख़ी-ए-मंज़र ख़मोश

असलम महमूद

यार को दीदा-ए-ख़ूँ-बार से ओझल कर के

असलम कोलसरी

दिल-ए-पुर-ख़ूँ को यादों से उलझता छोड़ देते हैं

असलम कोलसरी

जश्न हम यूँ भी मनाएँ देर तक

असलम हनीफ़

लुटी बहार का सूखा गुलाब रहने दो

असलम हबीब

मैं सोचता हूँ कहीं तू ख़फ़ा न हो जाए

असलम फ़र्रुख़ी

बचपन के हैं ख़्वाब सुहाने तितली फूल और मैं

असलम फ़ैज़ी

फेंका था किस ने संग-ए-हवस रात ख़्वाब में

असलम आज़ाद

जगमगाती ख़्वाहिशों का नूर फैला रात भर

असलम आज़ाद

आँखों से मैं ने चख लिया मौसम के ज़हर को

असलम आज़ाद

हम ने हर ख़्वाब को ताबीर अता की 'असलम'

असलम अंसारी

वो रंग उड़े हैं कुछ अब के बरस बहारों के

असलम अंसारी

वो नख़्ल जो बार-वर हुए हैं

असलम अंसारी

कुछ तो ग़म-ख़ाना-ए-हस्ती में उजाला होता

असलम अंसारी

ख़फ़ा न हो कि तिरा हुस्न ही कुछ ऐसा था

असलम अंसारी

एक समुंदर एक किनारा एक सितारा काफ़ी है

असलम अंसारी

ऐन-मुमकिन है किसी तर्ज़-ए-अदा में आए

असलम अंसारी

ऐ मिरे दिल बता ख़्वाब बुनता है क्यूँ

अासिफ़ा ज़मानी

वो मेरे ख़्वाब ले के सिरहाने खड़ा रहा

अासिफ़ा निशात

दरयाफ़्त कर लिया है बसाया नहीं मुझे

अासिफ़ा निशात

ये मो'जिज़ा भी किसी रोज़ कर ही जाना है

अासिफ़ शफ़ी

कार-ए-दुनिया से गए दीदा-ए-बेदार के साथ

अासिफ़ शफ़ी

जमाल-ए-यार को तस्वीर करने वाले थे

अासिफ़ शफ़ी

जहान-ए-हुस्न-ओ-नज़र से किनारा करना है

अासिफ़ शफ़ी

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