भगवान Poetry (page 19)

ऐ दिल न कर तू फ़िक्र पड़ेगा बला के हाथ

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

अब की चमन में गुल का ने नाम ओ ने निशाँ है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

जान आँखों में रही जी से गुज़रने न दिया

शैख़ अब्दुल लतीफ़ तपिश

ज़िंदगी को हम वफ़ा तक वो जफ़ा तक ले गए

शहज़ाद क़मर

छोड़ कर वो हम को तन्हा किस जहाँ में जा बसा

शहज़ाद हुसैन साइल

सोचिए गर उसे हर नफ़स मौत है कुछ मुदावा भी हो बे-हिसी के लिए

शहज़ाद अंजुम बुरहानी

मर जाने की उस दिल में तमन्ना भी नहीं है

शहज़ाद अंजुम बुरहानी

क्या हमारे शौक़ भी वो कज-अदा ले जाएगा

शहज़ाद अंजुम बुरहानी

ख़ल्क़ बे-परवा ख़ुदा बंदों से तंग आया हुआ

शहज़ाद अहमद

जिस को जाना ही नहीं उस को ख़ुदा क्यूँ मानें

शहज़ाद अहमद

जवाज़ कोई अगर मेरी बंदगी का नहीं

शहज़ाद अहमद

घबरा के आसमाँ की तरफ़ देखती थी ख़ल्क़

शहज़ाद अहमद

अब तो इंसान की अज़्मत भी कोई चीज़ नहीं

शहज़ाद अहमद

हम कि इंसान नहीं आँखें हैं

शहज़ाद अहमद

वाक़िआ कोई न जन्नत में हुआ मेरे ब'अद

शहज़ाद अहमद

न सही कुछ मगर इतना तो किया करते थे

शहज़ाद अहमद

कौन कहता है कि दरिया में रवानी कम है

शहज़ाद अहमद

जो शजर सूख गया है वो हरा कैसे हो

शहज़ाद अहमद

इस दौर-ए-बे-दिली में कोई बात कैसे हो

शहज़ाद अहमद

इस भरे शहर में आराम मैं कैसे पाऊँ

शहज़ाद अहमद

देखने उस को कोई मेरे सिवा क्यूँ आए

शहज़ाद अहमद

देख अब अपने हयूले को फ़ना होते हुए

शहज़ाद अहमद

बाग़-ए-बहिश्त के मकीं कहते हैं मर्हबा मुझे

शहज़ाद अहमद

आती है दम-ब-दम ये सदा जागते रहो

शहज़ाद अहमद

ज़वाल की हद

शहरयार

एक और साल गिरह

शहरयार

तमाम ख़ल्क़-ए-ख़ुदा देख के ये हैराँ है

शहरयार

वो बात

शहराम सर्मदी

मुनकिर-ए-हक़

शहराम सर्मदी

ऐसा हो कि ना-मौऊद हो

शहराम सर्मदी

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