भगवान Poetry (page 25)

नया मज़मूँ किताब-ए-ज़ीस्त का हूँ

सलीम अहमद

मंज़िल-ए-बे-जहत की ख़ैर सई-ए-सफ़र है राएगाँ

सलीम अहमद

मजबूरियों का पास भी कुछ था वफ़ा के साथ

सलीम अहमद

लम्हा-ए-रफ़्ता का दिल में ज़ख़्म सा बन जाएगा

सलीम अहमद

कोई सितारा-ए-गिर्दाब आश्ना था मैं

सलीम अहमद

इश्क़ में जिस के ये अहवाल बना रक्खा है

सलीम अहमद

इश्क़ और नंग-ए-आरज़ू से आर

सलीम अहमद

दिल हुस्न को दान दे रहा हूँ

सलीम अहमद

रोज़ पूजा के लिए फूल सजाता है 'सलाम'

सलाम मछली शहरी

ये धरती ख़ूब-सूरत है

सलाम मछली शहरी

बन गई है मौत कितनी ख़ुश-अदा मेरे लिए

सलाम मछली शहरी

अब अयादत को मिरी कोई नहीं आएगा

सलाम मछली शहरी

की ख़िताबत को गर ख़ुदा समझा

सख़ी लख़नवी

देखें कहता है ख़ुदा हश्र के दिन

सख़ी लख़नवी

दफ़्न हम हो चुके तो कहते हैं

सख़ी लख़नवी

बात करने में होंट लड़ते हैं

सख़ी लख़नवी

क़ब्र में अब किसी का ध्यान नहीं

सख़ी लख़नवी

इश्क़ है यार का ख़ुदा-हाफ़िज़

सख़ी लख़नवी

है चमन में रहम गुलचीं को न कुछ सय्याद को

सख़ी लख़नवी

दिल उसे दे दिया 'सख़ी' ही तो है

सख़ी लख़नवी

वो तेरी इनायत की सज़ा याद है अब तक

सज्जाद बाक़र रिज़वी

उस सादा-दिल से कुछ मुझे 'बाक़र' गिला न था

सज्जाद बाक़र रिज़वी

निखरा ख़िज़ाँ से रंग-ए-बहाराँ है इन दिनों

सज्जाद बाक़र रिज़वी

हमें चार सम्त की दौड़ में वही गर्द-ए-बाद-ए-सदा मिला

सज्जाद बाक़र रिज़वी

दिल दश्त है वफ़ूर-ए-तमन्ना ग़ुबार है

सज्जाद बाक़र रिज़वी

'बाक़र' निशाना-ए-ग़म-ओ-रंज-ओ-अलम तो हो

सज्जाद बाक़र रिज़वी

अहद-ए-वफ़ा सुबुक-हवा रंग-ए-वफ़ा के साथ साथ

सज्जाद बाक़र रिज़वी

खोल कर बात का भरम दोनों

सज्जाद बलूच

खोल कर बात का भरम दोनों

सज्जाद बलूच

वो इश्क़ जो हम को लाहिक़ था

साजिदा ज़ैदी

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