भगवान Poetry (page 29)

काफ़िर बुतों के नाम हों क्यूँकर तमाम हिफ़्ज़

रियाज़ ख़ैराबादी

जो हम आए तो बोतल क्यूँ अलग पीर-ए-मुग़ाँ रख दी

रियाज़ ख़ैराबादी

इश्क़ में दिल-लगी सी रहती है

रियाज़ ख़ैराबादी

दर्द हो तो दवा करे कोई

रियाज़ ख़ैराबादी

दर्द हो तो दवा करे कोई

रियाज़ ख़ैराबादी

अगर उन के लब पर गिला है किसी का

रियाज़ ख़ैराबादी

आप आए तो ख़याल-ए-दिल-ए-नाशाद आया

रियाज़ ख़ैराबादी

पास-ए-दीं कुफ़्र में भी था मलहूज़

रिन्द लखनवी

काबे को जाता किस लिए हिन्दोस्तान से मैं

रिन्द लखनवी

ज़माने में वो मह-लक़ा एक है

रिन्द लखनवी

वक़ार-ए-शाह-ए-ज़विल-इक्तदार देख चुके

रिन्द लखनवी

नीस्त बे-यार मुझ को हस्ती है

रिन्द लखनवी

क्यूँ-कर न लाए रंग गुलिस्ताँ नए नए

रिन्द लखनवी

ख़ामोश दाब-ए-इश्क़ को बुलबुल लिए हुए

रिन्द लखनवी

हैं ये सारे जीते-जी के वास्ते

रिन्द लखनवी

दिल-लगी ग़ैरों से बे-जा है मिरी जाँ छोड़ दे

रिन्द लखनवी

छुप के घर ग़ैर के जाया न करो

रिन्द लखनवी

ये इज़्न-ए-आम है ऐ वाइ'ज़ो आओ वुज़ू कर लो

रिफ़अतुल क़ासमी

नादान दिल-फ़रेब मोहब्बत न खा कभी

रिफ़अत सुलतान

मसर्रतों का खिला है हर एक सम्त चमन

रिफ़अत सुलतान

हुए जब से मोहब्बत-आश्ना हम

रिफ़अत सुलतान

घर को अब दश्त-ए-कर्बला लिक्खूँ

रिफ़अत सरोश

दीबाचा-ए-किताब-ए-वफ़ा है तमाम उम्र

रिफ़अत सरोश

जो सोचता हूँ अगर वो हवा से कह जाऊँ

रियाज़ मजीद

जब अगले साल यही वक़्त आ रहा होगा

रियाज़ मजीद

सुकूत-ए-शाम में गूँजी सदा उदासी की

रहमान फ़ारिस

सर-ब-सर यार की मर्ज़ी पे फ़िदा हो जाना

रहमान फ़ारिस

जो सहीफ़ों में लिखी है वो क़यामत हो जाए

रेहाना रूही

तुम्हीं बताओ वो कौन है जो हर एक लम्हा सता रहा है

रज़िया हलीम जंग

दर्द-ओ-ग़म सब सुनाने बैठे हैं

रज़ी रज़ीउद्दीन

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