भगवान Poetry (page 28)

पलकों पर नम क्या फैल गया

साबिर वसीम

तअल्लुक़ तुम से जो भी है नहीं मालूम कल क्या हो

साबिर रज़ा

हो कोई मसअला अपना दुआ पर छोड़ देते हैं

साबिर रज़ा

हैरान हूँ दो आँखों से क्या देख रहा हूँ

साबिर दत्त

क्या पता क्या था उधर और क्या न था

साबिर अदीब

वा'दा था कब का बार-ए-ख़ुदा सोचने तो दे

साबिर

रक्खे हर इक क़दम पे जो मुश्किल की आगही

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

अगर अल्फ़ाज़ से ग़म का इज़ाला हो गया होता

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

समझेगा आदमी को वहाँ कौन आदमी

सबा अकबराबादी

आप के लब पे और वफ़ा की क़सम

सबा अकबराबादी

उलझनों में कैसे इत्मीनान-ए-दिल पैदा करें

सबा अकबराबादी

चला-चल मोहलत-ए-आराम क्या है

सबा अकबराबादी

ज़ोम न कीजो शम्अ-रू बज़्म के सोज़ ओ साज़ पर

साइल देहलवी

वक़्त तो वक़्त है रुकता नहीं इक पल के लिए

सादुल्लाह शाह

हम को ख़ुश आया तिरा हम से ख़फ़ा हो जाना

सादुल्लाह शाह

नाव काग़ज़ की सही कुछ तो नज़र से गुज़रे

सादुल्लाह कलीम

मुस्तक़िल अब बुझा बुझा सा है

एस ए मेहदी

और अभी तेज़ दौड़ना है मुझे

रूही कंजाही

गुज़र चुके हैं बदन से आगे नजात का ख़्वाब हम हुए हैं

रियाज़ लतीफ़

मय-ख़ाने में क्यूँ याद-ए-ख़ुदा होती है अक्सर

रियाज़ ख़ैराबादी

ज़िद हमारी दुआ से होती है

रियाज़ ख़ैराबादी

ये कहाँ से हम गए हैं कहाँ कहें क्या तिरी तग-ओ-ताज़ में

रियाज़ ख़ैराबादी

वो गुल हैं न उन की वो हँसी है

रियाज़ ख़ैराबादी

उफ़ रे उभार उफ़ रे ज़माना उठान का

रियाज़ ख़ैराबादी

रंग पर कल था अभी लाला-ए-गुलशन कैसा

रियाज़ ख़ैराबादी

मुझ को न दिल पसंद न दिल की ये ख़ू पसंद

रियाज़ ख़ैराबादी

मर कर अरे वाइज़ कोई ज़िंदा नहीं होता

रियाज़ ख़ैराबादी

ले गया घर से उन्हें ग़ैर के घर का ता'वीज़

रियाज़ ख़ैराबादी

कोई पूछे न हम से क्या हुआ दिल

रियाज़ ख़ैराबादी

ख़्वाब में भी नज़र आ जाए जो घर की सूरत

रियाज़ ख़ैराबादी

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