भगवान Poetry (page 58)

कुफ़्र एक रंग-ए-क़ुदरत-ए-बे-इंतिहा में है

बहराम जी

'ज़फ़र' आदमी उस को न जानिएगा वो हो कैसा ही साहब-ए-फ़हम-ओ-ज़का

ज़फ़र

वाक़िफ़ हैं हम कि हज़रत-ए-ग़म ऐसे शख़्स हैं

ज़फ़र

शमशीर-ए-बरहना माँग ग़ज़ब बालों की महक फिर वैसी ही

ज़फ़र

नहीं इश्क़ में इस का तो रंज हमें कि क़रार ओ शकेब ज़रा न रहा

ज़फ़र

मैं हूँ आसी कि पुर-ख़ता कुछ हूँ

ज़फ़र

क्यूँकर न ख़ाकसार रहें अहल-ए-कीं से दूर

ज़फ़र

क्या कहूँ दिल माइल-ए-ज़ुल्फ़-ए-दोता क्यूँकर हुआ

ज़फ़र

हम ये तो नहीं कहते कि ग़म कह नहीं सकते

ज़फ़र

हवा में फिरते हो क्या हिर्स और हवा के लिए

ज़फ़र

गई यक-ब-यक जो हवा पलट नहीं दिल को मेरे क़रार है

ज़फ़र

देखो इंसाँ ख़ाक का पुतला बना क्या चीज़ है

ज़फ़र

बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो न थी

ज़फ़र

गिरे क़तरों में पत्थर पर सदा ऐसा भी होता है

अज़रा वहीद

बे-ख़ुदा होने के डर में बे-सबब रोता रहा

अज़रा परवीन

दिन

अज़रा अब्बास

वतन

अज़मतुल्लाह ख़ाँ

अजीब हालत है जिस्म-ओ-जाँ की हज़ार पहलू बदल रहा हूँ

अज़्म शाकरी

मैं ने चुप के अंधेरे में ख़ुद को रखा इक फ़ज़ा के लिए

अज़्म बहज़ाद

ज़रा सी देर में कश्कोल भरने वाला था

अज़लान शाह

क़ुबूल होती हुई बद-दुआ से डरते हैं

अज़लान शाह

डूबा सफ़ीना जिस में मुसाफ़िर कोई न था

अज़ीज़ुर्रहमान शहीद फ़तेहपुरी

लम्हों ने यूँ समेट लिया फ़ासला बहुत

अज़ीज़ुर्रहमान शहीद फ़तेहपुरी

उस ने मिरे मरने के लिए आज दुआ की

अज़ीज़ वारसी

तिरी तलाश में निकले हैं तेरे दीवाने

अज़ीज़ वारसी

नाला-ए-बे-आसमाँ

अज़ीज़ क़ैसी

ग़रीब शहर

अज़ीज़ क़ैसी

अहद-नामा-ए-इमराेज़

अज़ीज़ क़ैसी

अपनों के करम से या क़ज़ा से

अज़ीज़ क़ैसी

आह-ए-बे-असर निकली नाला ना-रसा निकला

अज़ीज़ क़ैसी

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