लोग Poetry (page 18)

यूँ एहतिमाम-ए-रद्द-ए-सहर कर दिया गया

सत्तार सय्यद

लहू में फूल खिलाने कहाँ से आते हैं

सत्तार सय्यद

जो लोग रह गए हैं मिरी दास्ताँ से दूर

सरवर नेपाली

पेपर-वेट

सरवत हुसैन

मैं तुम्हें याद कर रहा था

सरवत हुसैन

नींद से जागी हुई आँखों को अंधा कर दिया

सरमद सहबाई

मरने का पता दे मिरे जीने का पता दे

सरमद सहबाई

नज़र की धूप में आने से पहले

सरफ़राज़ ज़ाहिद

नज़र आते थे हम इक दूसरे को

सरफ़राज़ ज़ाहिद

ग़फ़लतों का समर उठाता हूँ

सरफ़राज़ ज़ाहिद

मौसमों वाले नए दाना ओ पानी वाले

सरफ़राज़ नवाज़

सफ़ीना मौज-ए-बला के लिए इशारा था

सरफ़राज़ दानिश

आँखें ज़मीन और फ़लक दस्तकार हैं

सरफ़राज़ आरिश

आँखों में अगर आप की सूरत नहीं होती

सरफ़राज़ अबद

कुछ लोग रब्त-ए-ख़ास से आगे निकल गए

सरफ़राज़ शाहिद

टूट के पत्थर गिरते रहते हैं दिन रात चटानों से

सरफ़राज़ आमिर

वहम जैसी शुकूक जैसी चीज़

सरदार सलीम

एक ही ज़िंदा बचा है ये निराला पागल

सरदार सलीम

मैं जिन को ढूँडने निकला था गहरे ग़ारों में

सदार आसिफ़

हम-सफ़र होता कोई तो बाँट लेते दूरियाँ

सरदार अंजुम

एक एक कर के लोग बिछड़ते चले गए

साक़ी फ़ारुक़ी

अजब कि सब्र की मीआद बढ़ती जाती है

साक़ी फ़ारुक़ी

मुहासबा

साक़ी फ़ारुक़ी

मौत की ख़ुशबू

साक़ी फ़ारुक़ी

हम-ज़ाद

साक़ी फ़ारुक़ी

यहीं कहीं पे कभी शोला-कार मैं भी था

साक़ी फ़ारुक़ी

वो लोग जो ज़िंदा हैं वो मर जाएँगे इक दिन

साक़ी फ़ारुक़ी

तुझे ख़बर है तुझे याद क्यूँ नहीं करते

साक़ी फ़ारुक़ी

सुर्ख़ चमन ज़ंजीर किए हैं सब्ज़ समुंदर लाया हूँ

साक़ी फ़ारुक़ी

सफ़र की धूप में चेहरे सुनहरे कर लिए हम ने

साक़ी फ़ारुक़ी

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