लोग Poetry (page 20)

वो जिन के नक़्श-ए-क़दम देखने में आते हैं

सलीम कौसर

तारे जो कभी अश्क-फ़िशानी से निकलते

सलीम कौसर

न इस तरह कोई आया है और न आता है

सलीम कौसर

मोहलत न मिली ख़्वाब की ताबीर उठाते

सलीम कौसर

कुछ भी था सच के तरफ़-दार हुआ करते थे

सलीम कौसर

कोई याद ही रख़्त-ए-सफ़र ठहरे कोई राहगुज़र अनजानी हो

सलीम कौसर

किस की तहवील में थे किस के हवाले हुए लोग

सलीम कौसर

कहानी लिखते हुए दास्ताँ सुनाते हुए

सलीम कौसर

डूबने वाले भी तन्हा थे तन्हा देखने वाले थे

सलीम कौसर

चराग़-ए-याद की लौ हम-सफ़र कहाँ तक है

सलीम कौसर

बदल गया है सभी कुछ उस एक साअत में

सलीम कौसर

आब ओ हवा है बरसर-ए-पैकार कौन है

सलीम कौसर

आख़िरी पड़ाव

सलीम फ़िगार

कहीं आँखें कहीं बाज़ू कहीं से सर निकल आए

सलीम फ़िगार

ग़मों की आग पे सब ख़ाल-ओ-ख़द सँवारे गए

सलीम फ़िगार

ग़मों की आग पे सब ख़ाल-ओ-ख़द सँवारे गए

सलीम फ़िगार

वो तीरगी-ए-शब है कि घर लौट गए हैं

सलीम फ़राज़

किस ने कहा कि मुझ को ये दुनिया नहीं पसंद

सलीम फ़राज़

हर-चंद मिरा शौक़-ए-सफ़र यूँ न रहेगा

सलीम फ़राज़

उस मुल्क में भी लोग क़यामत के हैं मुंकिर

सलीम बेताब

जी में आता है कि इक रोज़ ये मंज़र देखें

सलीम बेताब

आग सी बरसती है सब्ज़ सब्ज़ पत्तों से

सलीम बेताब

ये नहीं है कि नवाज़े न गए हों हम लोग

सलीम अहमद

ये कैसे लोग हैं सदियों की वीरानी में रहते हैं

सलीम अहमद

ख़मोशी के हैं आँगन और सन्नाटे की दीवारें

सलीम अहमद

बदन की आग को कहते हैं लोग झूटी आग

सलीम अहमद

वो लोग भी हैं जो मौजों से डर गए होंगे

सलीम अहमद

स्वाँग भरता हूँ तिरे शहर में सौदाई का

सलीम अहमद

समाअतों को अमीन-ए-नवा-ए-राज़ किया

सलीम अहमद

मुझे इन आते जाते मौसमों से डर नहीं लगता

सलीम अहमद

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