लोग Poetry (page 22)
क्या जानें तिरी उम्मत किस हाल को पहुँचेगी
साहिर लुधियानवी
जुर्म-ए-उल्फ़त पे हमें लोग सज़ा देते हैं
साहिर लुधियानवी
जो लुत्फ़-ए-मय-कशी है निगारों में आएगा
साहिर लुधियानवी
इस तरफ़ से गुज़रे थे क़ाफ़िले बहारों के
साहिर लुधियानवी
ख़्वाब देखे थे सुहाने कितने
साहिर होशियारपुरी
क्या परिंदे लौट कर आए नहीं
साहिल अहमद
तंग आते भी नहीं कशमकश-ए-दहर से लोग
सहर अंसारी
मौत के बाद ज़ीस्त की बहस में मुब्तला थे लोग
सहर अंसारी
हम को जन्नत की फ़ज़ा से भी ज़ियादा है अज़ीज़
सहर अंसारी
तंग आते भी नहीं कशमकश-ए-दहर से लोग
सहर अंसारी
न किसी से करम की उम्मीद रखें न किसी के सितम का ख़याल करें
सहर अंसारी
न दोस्ती से रहे और न दुश्मनी से रहे
सहर अंसारी
हम अहल-ए-ज़र्फ़ कि ग़म-ख़ाना-ए-हुनर में रहे
सहर अंसारी
अब यही रंज-ए-बे-दिली मुझ को मिटाए या बनाए
सहर अंसारी
उन से बचना कि बिछाते हैं पनाहें पहले
सग़ीर मलाल
वो हक़ीक़त में एक लम्हा था
सग़ीर मलाल
निकल गए थे जो सहरा में अपने इतनी दूर
सग़ीर मलाल
न जाने क्यूँ सदा होता है एक सा अंजाम
सग़ीर मलाल
किसी इंसान को अपना नहीं रहने देते
सग़ीर मलाल
किरदार कह रहे हैं कुछ अपनी ज़बान में
सग़ीर मलाल
एक रहने से यहाँ वो मावरा कैसे हुआ
सग़ीर मलाल
अलग हैं हम कि जुदा अपनी रह-गुज़र में हैं
सग़ीर मलाल
ये जो दीवाने से दो चार नज़र आते हैं
साग़र सिद्दीक़ी
ये जो दीवाने से दो चार नज़र आते हैं
साग़र सिद्दीक़ी
साक़ी की इक निगाह के अफ़्साने बन गए
साग़र सिद्दीक़ी
मआल-ए-नग़्मा-ओ-मातम फ़रोख़्त होता है
साग़र सिद्दीक़ी
जज़्बा-ए-सोज़-ए-तलब को बे-कराँ करते चलो
साग़र सिद्दीक़ी
उस्ताद मर गए
साग़र ख़य्यामी
उल्टी गंगा
साग़र ख़य्यामी
रोटी कपड़ा और मकान
साग़र ख़य्यामी
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