लोग Poetry (page 24)

मुस्तक़र की ख़्वाहिश में मुंतशिर से रहते हैं

साबिर

ये दिल की दास्तान है कि दिल ग़ुलाम कर दिया

सबीहा सबा, पाकिस्तान

ब-ज़ाहिर रौनक़ों में बज़्म-आराई में जीते हैं

सबिहा सबा, न्यूयार्क

आँखों में वो आएँ तो हँसाते हैं मुझे ख़्वाब

सबीला इनाम सिद्दीक़ी

कहाँ पे बिछड़े थे हम लोग कुछ पता मिल जाए

सबा जायसी

हम ने ख़ाक-ए-दर-ए-महबूब जो चेहरे पे मली

सबा जायसी

आवाज़ के पत्थर जो कभी घर में गिरे हैं

सबा इकराम

पूरी मिरे जुनूँ की ज़रूरत न कर सके

सबा अकबराबादी

ये रात दिन का बदलना नज़र में रहता है

सादुल्लाह शाह

ये मत भुला कि यहाँ जिस क़दर उजाले हैं

सअादत बाँदवी

दिल में हो गर ख़्वाहिश-ए-तस्वीर-ए-इबरत देखना

सअादत बाँदवी

ये किस हसीन ने लोगों को रोक रक्खा है

रूही कंजाही

किसी भी काम का मेरा हुनर नहीं न सही

रूही कंजाही

किस लिए फिरता हूँ तन्हा न किसी ने पूछा

रूही कंजाही

इस शोला-ख़ू की तरह बिगड़ता नहीं कोई

रूही कंजाही

गरचे मिरे ख़ुलूस से वो बे-ख़बर न था

रोहित सोनी ‘ताबिश’

चहार सम्त से कल तक जो घर दमकता था

रिज़्वानुल्लाह

ये कहाँ से हम गए हैं कहाँ कहें क्या तिरी तग-ओ-ताज़ में

रियाज़ ख़ैराबादी

रूठे हुए कि अपने ज़रा अब मनाए ज़ुल्फ़

रियाज़ ख़ैराबादी

जो पिलाए वो रहे यारब मय-ओ-साग़र से ख़ुश

रियाज़ ख़ैराबादी

जफ़ा में नाम निकालो न आसमाँ की तरह

रियाज़ ख़ैराबादी

जाने वाले न हम उस कूचे में आने वाले

रियाज़ ख़ैराबादी

छेड़ते हैं गुदगुदाते हैं फिर अरमाँ आज-कल

रियाज़ ख़ैराबादी

बहुत ही पर्दे में इज़हार-ए-आरज़ू करते

रियाज़ ख़ैराबादी

हर एक जिस्म पे बस एक ही से गहने लगे

रिन्द साग़री

वक़ार-ए-शाह-ए-ज़विल-इक्तदार देख चुके

रिन्द लखनवी

नहीं क़ौल से फ़ेल तेरे मुताबिक़

रिन्द लखनवी

चढ़ी तेरे बीमार-ए-फ़ुर्क़त को तब है

रिन्द लखनवी

मसर्रतों का खिला है हर एक सम्त चमन

रिफ़अत सुलतान

जब याद आया तेरा महकता बदन मुझे

रिफ़अत अल हुसैनी

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