लोग Poetry (page 23)

पस-ए-रौशनी

साग़र ख़य्यामी

इक्कीसवीं सदी का आदमी

साग़र ख़य्यामी

फूलों से बदन उन के काँटे हैं ज़बानों में

साग़र आज़मी

शहर के लोग जिसे तेरी सितम-ज़ाई कहें

सफ़दर सलीम सियाल

मोहब्बतों में भी माल-ओ-मनाल माँगते हैं

सफ़दर सलीम सियाल

मासूमियत

सईदुद्दीन

कुछ लोग थे सफ़र में मगर हम-ज़बाँ न थे

सईद नक़वी

चाहे हमारा ज़िक्र किसी भी ज़बाँ में हो

सईद नक़वी

ये हादसा भी तो कुछ कम न था सबा के लिए

सईद अहमद अख़्तर

कुछ लोग इब्तिदा-ए-रिफ़ाक़त से क़ब्ल ही

सईद अहमद

शोरिश-ए-वक़्त हुई वक़्त की रफ़्तार में गुम

सईद अहमद

इक बर्ग-ए-ख़ुश्क से गुल-ए-ताज़ा तक आ गए

सईद अहमद

किस मुँह से ज़िंदगी को वो रख़्शंदा कह सकें

सादिक़ नसीम

अज़मत-ए-फ़िक्र के अंदाज़ अयाँ भी होंगे

सादिक़ नसीम

कैसे सच से रहे बे-ख़बर आइना

सचिन शालिनी

यहाँ है धूप वहाँ साए हैं चले जाओ

साबिर ज़फ़र

वो लोग आज ख़ुद इक दास्ताँ का हिस्सा हैं

साबिर ज़फ़र

तुम्हें तो क़ब्र की मिट्टी भी अब पुकारती है

साबिर ज़फ़र

यहाँ है धूप वहाँ साए हैं चले जाओ

साबिर ज़फ़र

सितारे सो गए तो आसमाँ कैसा लगेगा

साबिर ज़फ़र

नए कपड़े बदल और बाल बना तिरे चाहने वाले और भी हैं

साबिर ज़फ़र

ख़ुमार-ए-शब में जो इक दूसरे पे गिरते हैं

साबिर ज़फ़र

ख़िज़ाँ की रुत है जनम-दिन है और धुआँ और फूल

साबिर ज़फ़र

काम इतनी ही फ़क़त राहगुज़र आएगी

साबिर ज़फ़र

ये महर ओ मह बे-चराग़ ऐसे कि राख बन कर बिखर रहे हैं

साबिर वसीम

खिले हुए हैं फूल सितारे दरिया के उस पार

साबिर वसीम

असीर-ए-शाम हैं ढलते दिखाई देते हैं

साबिर वसीम

हैरान हूँ दो आँखों से क्या देख रहा हूँ

साबिर दत्त

यूँ तो मिलने को लोग मिलते हैं

साबिर बद्र जाफ़री

'बद्र' जब आगही से मिलता है

साबिर बद्र जाफ़री

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