लोग Poetry (page 25)

मुसाफ़िरत के तहय्युर से कट के कब आए

रियाज़ मजीद

बदल सका न जुदाई के ग़म उठा कर भी

रियाज़ मजीद

ख़ुदा से उसे माँग कर देखते हैं

रेनू नय्यर

ख़ुदा से उसे माँग कर देखते हैं

रेनू नय्यर

कहानी ख़त्म हुई और ऐसी ख़त्म हुई

रहमान फ़ारिस

सदाएँ देते हुए और ख़ाक उड़ाते हुए

रहमान फ़ारिस

सदाएँ देते हुए और ख़ाक उड़ाते हुए

रहमान फ़ारिस

किसी की चश्म-ए-गुरेज़ाँ में जल बुझे हम लोग

रेहाना रूही

शहर अपना है मगर लोग कहाँ हैं अपने

रज़्ज़ाक़ अफ़सर

हम रूह-ए-सफ़र हैं हमें नामों से न पहचान

राज़ी अख्तर शौक़

वो तमाम रंग अना के थे वो उमंग सारी लहू से थी

राज़ी अख्तर शौक़

शायद अब रूदाद-ए-हुनर में ऐसे बाब लिखे जाएँगे

राज़ी अख्तर शौक़

कुछ लोग समझने ही को तयार नहीं थे

राज़ी अख्तर शौक़

ख़ुश्बू हैं तो हर दौर को महकाएँगे हम लोग

राज़ी अख्तर शौक़

जिस ने बनाया हर आईना मैं ही था

राज़ी अख्तर शौक़

हम जहाँ नग़्मा-ओ-आहंग लिए फिरते हैं

राज़ी अख्तर शौक़

दिन का मलाल शाम की वहशत कहाँ से लाएँ

राज़ी अख्तर शौक़

ये किस दयार के हैं किस के ख़ानदान से हैं

रज़ा मौरान्वी

इश्क़ की बीमारी है जिन को दिल ही दिल में गलते हैं

रज़ा अज़ीमाबादी

महरूमियों का अपनी न शिकवा हो क्यूँ हमें

रज़ा अमरोही

बादा-ए-गुल को सब अंदोह-रुबा कहते हैं

रविश सिद्दीक़ी

पर्बत टीले बंद मकानों जैसे थे

रवी कुमार

ना-तवानी में भी वो किरदार होना चाहिए

रौनक़ नईम

क़रीब भी तो नहीं हो कि आ के सो जाओ

रउफ़ रज़ा

रस्ते में तो ख़तरात की सुन-गुन भी बहुत है

रऊफ़ ख़ैर

पत्ते तमाम हल्क़ा-ए-सरसर में रह गए

रऊफ़ ख़ैर

ना-ख़ुश गदाई से न वो शाही से ख़ुश हुए

रऊफ़ ख़ैर

मैं जंग जीत के जब्र-ओ-अना की हार गया

रासिख़ इरफ़ानी

जवाँ रुतों में लगाए हुए शजर अपने

रासिख़ इरफ़ानी

शुऊर-ए-ज़ीस्त सही ए'तिबार करना भी

रशक खलीली

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