दृश्य Poetry (page 32)

जी रहा हूँ मैं उदासी भरी तस्वीर के साथ

अज़हर नैयर

हरे दरख़्त का शाख़ों से रिश्ता टूट गया

अज़हर नैयर

जल्वे हवा के दोश ये कोई घटा के देख

अज़हर लखनवी

दिल की गली में चाँद निकलता रहता है

अज़हर इक़बाल

सब देख कर गुज़र गए इक पल में और हम

अज़हर इनायती

क़यामत आएगी माना ये हादिसा होगा

अज़हर इनायती

कभी क़रीब कभी दूर हो के रोते हैं

अज़हर इनायती

इस बार उन से मिल के जुदा हम जो हो गए

अज़हर इनायती

हर एक रात को महताब देखने के लिए

अज़हर इनायती

फ़िक्र में हैं हमें बुझाने की

अज़हर इनायती

तस्बीह-ए-कुमरी सर्व-ए-सनोबर समेट लो

अज़हर हाश्मी

मिरे वजूद का मेहवर चमकता रहता है

अज़हर हाश्मी

जफ़ाओं की नुमाइश है किसी से कुछ नहीं बोलें

अज़हर हाश्मी

आज़ुर्दा निगाहों पे ये मंज़र नहीं उतरा

अज़हर हाश्मी

सारे मंज़र में समाया हुआ लगता है मुझे

अज़हर अदीब

देख क़िंदील रुख़-ए-यार की जानिब मत देख

अज़हर अब्बास

सहरा का कोई फूल मोअ'त्तर तो नहीं था

अज़ीम कुरेशी

देखने वाले मुझे मेरी नज़र से देख ले

आज़ाद गुलाटी

साहिल पे रुक के सू-ए-समुंदर न देखिए

आज़ाद गुलाटी

मेरा तो नाम रेत के सागर पे नक़्श है

आज़ाद गुलाटी

मैं बिछड़ कर तुझ से तेरी रूह के पैकर में हूँ

आज़ाद गुलाटी

मैं अपने आप से इक खेल करने वाला हूँ

आज़ाद गुलाटी

हमारी आँख में ठहरा हुआ समुंदर था

आज़ाद गुलाटी

बहुत लम्बा सफ़र तपती सुलगती ख़्वाहिशों का था

आज़ाद गुलाटी

न कोई दिन न कोई रात इंतिज़ार की है

अय्यूब ख़ावर

न कोई दिन न कोई रात इंतिज़ार की है

अय्यूब ख़ावर

लहरों में बदन उछालते हैं

अय्यूब ख़ावर

हरीम-ए-हुस्न से आँखों के राब्ते रखना

अय्यूब ख़ावर

हम तसव्वुर में उन के उभरने लगे

अय्यूब जौहर

ख़ुश बहुत आते हैं मुझ को रास्ते दुश्वार से

औरंगज़ेब

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