नाम Poetry (page 25)

तिरे ही नाम की सिमरण है मुझ को और तस्बीह

शाह नसीर

न क्यूँ कि अश्क-ए-मुसलसल हो रहनुमा दिल का

शाह नसीर

लिया न हाथ से जिस ने सलाम आशिक़ का

शाह नसीर

जो ऐन वस्ल में आराम से नहीं वाक़िफ़

शाह नसीर

गो सियह-बख़्त हूँ पर यार लुभा लेता है

शाह नसीर

दिल को किस सूरत से कीजे चश्म-ए-दिलबर से जुदा

शाह नसीर

बे-मेहर-ओ-वफ़ा है वो दिल-आराम हमारा

शाह नसीर

बदन-दरीदा-ओ-बे-बर्ग-ओ-बार होना भी

शाह हुसैन नहरी

इस्लाम और कुफ़्र हमारा ही नाम है

शाह आसिम

उट्ठी है जब से दिल में मिरे इश्क़ की तरंग

शाह आसिम

इस्लाम और कुफ़्र हमारा ही नाम है

शाह आसिम

है फ़ना बिस्मिल्लाह-ए-दीवान-ए-इश्क़

शाह आसिम

बंदा-ए-इश्क़ हूँ जुज़ यार मुझे काम नहीं

शाह आसिम

सवाल करता नहीं और जवाब उस की तलब

शफ़ीक़ सलीमी

ख़ल्क़-ए-ख़ुदा है शाह की मुख़्बर लगी हुई

शफ़ीक़ सलीमी

बे-नाम दयारों से हम लोग भी हो आए

शफ़ीक़ सलीमी

बे-नाम दयारों का सफ़र कैसा लगा है

शफ़ीक़ सलीमी

मनाज़िर हसीं हैं जो राहों में मेरी

शफ़ीक़ ख़लिश

हम उन से कर गए हैं किनारा कभी कभी

शादाँ इंदौरी

आदतन मायूस अब तो शाम है

शादाब उल्फ़त

ख़्वाह मुफ़्लिसी से निकल गया या तवंगरी से निकल गया

शाद बिलगवी

ये रात भयानक हिज्र की है काटेंगे बड़े आलाम से हम

शाद अज़ीमाबादी

लुत्फ़ क्या है बे-ख़ुदी का जब मज़ा जाता रहा

शाद अज़ीमाबादी

किस बुरी साअत से ख़त ले कर गया

शाद अज़ीमाबादी

अगर मरते हुए लब पर न तेरा नाम आएगा

शाद अज़ीमाबादी

अब इंतिहा का तिरे ज़िक्र में असर आया

शाद अज़ीमाबादी

हाथ न आई दुनिया भी और इश्क़ में भी गुमनाम रहे

शबनम शकील

हर रोज़ राह तकती हैं मेरे सिंघार की

शबनम शकील

इक बे-नाम सी खोज है दिल को जिस के असर में रहते हैं

शबनम शकील

दूर हुआ इबहाम कहानी ख़त्म हुई

शबनम शकील

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