नाम Poetry (page 28)
हाँ मेरी महबूबा
सरमद सहबाई
मिल-जुल कर ईमान ख़ुदा पर ला सकते हैं
सरफ़राज़ ज़ाहिद
कभी होंटों पे ऐसा लम्स अपनी आँख खोले
सरफ़राज़ ज़ाहिद
बला से नाम वो मेरा उछाल देता है
सरफ़राज़ नवाज़
मैं जिस को सोचता रहता हूँ क्या है वो आख़िर
सरफ़राज़ ख़ालिद
जहाँ सुल्ताना पढ़ती थी
सरफ़राज़ शाहिद
डॉज-महल
सरफ़राज़ शाहिद
ऐसे लगे है नौकरी माल-ए-हराम के बग़ैर
सरफ़राज़ शाहिद
जिसे तू ने समझा है ज़िंदगी उसी इंक़लाब का नाम है
सरीर काबिरी
उन को देखा तो तबीअ'त में रवानी आई
सरदार सोज़
कभी सुर्ख़ी से लिखता हूँ कभी काजल से लिखता हूँ
सरदार सलीम
कुछ बद-गुमानियाँ हैं कुछ बद-ज़बानियाँ हैं
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
बोसा देते हो अगर तुम मुझ को दो दो सब के दो
सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी
ये ख़ल्क़ सारी हवा मेरे नाम कर देगी
सदार आसिफ़
लाख समझाया मगर ज़िद पे अड़ी है अब भी
सदार आसिफ़
लफ़्ज़ों का ये ख़ज़ाना तिरे नाम कब हुआ
सदार आसिफ़
जब कभी तेरा नाम लेते हैं
सरदार अंजुम
हम-सफ़र होता कोई तो बाँट लेते दूरियाँ
सरदार अंजुम
शैली बेटी के नाम
सारा शगुफ़्ता
परिंदे की आँख खुल जाती है
सारा शगुफ़्ता
कैसे टहलता है चाँद
सारा शगुफ़्ता
आधा कमरा
सारा शगुफ़्ता
यूँ अकेला दश्त-ए-ग़ुर्बत में दिल-ए-नाकाम था
साक़िब लखनवी
न आसमान है साकित न दिल ठहरता है
साक़िब लखनवी
नामों का इक हुजूम सही मेरे आस-पास
साक़ी फ़ारुक़ी
तर्ग़ीब
साक़ी फ़ारुक़ी
पाँव मारा था पहाड़ों पे तो पानी निकला
साक़ी फ़ारुक़ी
मुझ को मिरी शिकस्त की दोहरी सज़ा मिली
साक़ी फ़ारुक़ी
मुझे ख़बर थी मिरा इंतिज़ार घर में रहा
साक़ी फ़ारुक़ी
जान प्यारी थी मगर जान से बे-ज़ारी थी
साक़ी फ़ारुक़ी
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