नज़र Poetry (page 100)

एक ही ख़त में है क्या हाल जो मज़कूर नहीं

अज़ीज़ लखनवी

दिल कुश्ता-ए-नज़र है महरूम-ए-गुफ़्तुगू हूँ

अज़ीज़ लखनवी

दिल का छाला फूटा होता

अज़ीज़ लखनवी

बाज़ी-ए-इश्क़ मरे बैठे हैं

अज़ीज़ लखनवी

देखता हूँ उन की सूरत देख कर

अज़ीज़ हैदराबादी

अयाँ या निहाँ इक नज़र देख लेते

अज़ीज़ हैदराबादी

अभी कुछ है अभी कुछ है अभी कुछ

अज़ीज़ हैदराबादी

वहशत-ए-दिल का अजब रंग नज़र आता है

अज़ीज़ हैदराबादी

शोख़ी उफ़-रे तिरी नज़र की

अज़ीज़ हैदराबादी

शोख़ी से कश्मकश नहीं अच्छी हिजाब की

अज़ीज़ हैदराबादी

क्यूँ ख़फ़ा हो क्यूँ इधर आते नहीं

अज़ीज़ हैदराबादी

दर्द जाता नज़र नहीं आता

अज़ीज़ हैदराबादी

वही दाग़-ए-लाला की बात है कि ब-नाम-ए-हुस्न उधर गई

अज़ीज़ हामिद मदनी

मिरी आँखें गवाह-ए-तल'अत-ए-आतिश हुईं जल कर

अज़ीज़ हामिद मदनी

इस गुफ़्तुगू से यूँ तो कोई मुद्दआ नहीं

अज़ीज़ हामिद मदनी

हिकायत-ए-हुस्न-ए-यार लिखना हदीस-ए-मीना-ओ-जाम कहना

अज़ीज़ हामिद मदनी

हज़ार वक़्त के परतव-नज़र में होते हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी

हवा आशुफ़्ता-तर रखती है हम आशुफ़्ता-हालों को

अज़ीज़ हामिद मदनी

ग़लत-बयाँ ये फ़ज़ा महर ओ कीं दरोग़ दरोग़

अज़ीज़ हामिद मदनी

आतिश-ए-मीना नज़र आई हरीफ़ाना मुझे

अज़ीज़ हामिद मदनी

ये हौसला भी किसी रोज़ कर के देखूँगी

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

वो इक नज़र से मुझे बे-असास कर देगा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

थकन से चूर हूँ लेकिन रवाँ-दवाँ हूँ मैं

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

टटोलता हुआ कुछ जिस्म ओ जान तक पहुँचा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

किस क़दर कम-असास हैं कुछ लोग

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

अपनी बीती हुई रंगीन जवानी देगा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

कुछ ज़िंदगी में इश्क़-ओ-वफ़ा का हुनर भी रख

अज़ीज़ अन्सारी

यही नहीं कि नज़र को झुकाना पड़ता है

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

ख़ाक ओ ख़ला का हिसार और मैं

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

देखिए चलता है पैमाना किधर से पहले

अज़हर लखनवी

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