नज़र Poetry (page 130)

आग लगा दी पहले गुलों ने बाग़ में वो शादाबी की

आग़ा हज्जू शरफ़

सुबू उठाऊँ तो पीने के बीच खुलती है

अफ़ज़ाल नवेद

आँचल में नज़र आती हैं कुछ और सी आँखें

अफ़ज़ाल नवेद

चाँद में कैसे नज़र आए तिरी सूरत मुझे

अफ़ज़ल मिनहास

उस पेड़ को छुआ तो समर-दार हो गया

अफ़ज़ल मिनहास

मैं फ़क़त इस जुर्म में दुनिया में रुस्वा हो गया

अफ़ज़ल मिनहास

जो शख़्स भी मिला है वो इक ज़िंदा लाश है

अफ़ज़ल मिनहास

अपने माहौल से कुछ यूँ भी तो घबराए न थे

अफ़ज़ल मिनहास

अपने माहौल से कुछ यूँ भी तो घबराए न थे

अफ़ज़ल मिनहास

तो फिर वो इश्क़ ये नक़्द-ओ-नज़र बराए-फ़रोख़्त

अफ़ज़ल ख़ान

तभी तो मैं मोहब्बत का हवालाती नहीं होता

अफ़ज़ल ख़ान

हमारे ख़ून के प्यासे पशेमानी से मर जाएँ

अफ़ज़ल ख़ान

यहाँ भला कौन अपनी मर्ज़ी से जी रहा है

अफ़ज़ल गौहर राव

मिरी नज़र तो ख़लाओं ने बाँध रक्खी थी

अफ़ज़ल गौहर राव

ये जो सूरज है ये सूरज भी कहाँ था पहले

अफ़ज़ल गौहर राव

इसी लिए भी नए सफ़र से बंधे हुए हैं

अफ़ज़ल गौहर राव

हर आइने में तिरा ही धुआँ दिखाई दिया

अफ़ज़ल गौहर राव

ये हक़ीक़त है वो कमज़ोर हुआ करती हैं

अफ़ज़ल इलाहाबादी

ये बता दे मुझ को मेरे दिल किसे आवाज़ दूँ

अफ़ज़ल इलाहाबादी

तुम हमारे हो हम तुम्हारे हैं

अफ़ज़ल इलाहाबादी

मिरी दीवानगी की हद न पूछो तुम कहाँ तक है

अफ़ज़ल इलाहाबादी

लुटा रहा हूँ मैं लाल-ओ-गुहर अँधेरे में

अफ़ज़ल इलाहाबादी

किसी की याद रुलाये तो क्या किया जाए

अफ़ज़ल इलाहाबादी

जहाँ तुम ये नज़्म ख़त्म करोगी

अफ़ज़ाल अहमद सय्यद

हम कसी से पूछे बग़ैर ज़िंदा रहते हैं

अफ़ज़ाल अहमद सय्यद

टूटा हुआ आईना जो रस्ते में पड़ा था

आफ़ताब शम्सी

मेरे गले से आन के प्यारा जो फिर लगे

आफ़ताब शाह आलम सानी

ये पेड़ ये पहाड़ ज़मीं की उमंग हैं

आफ़ताब इक़बाल शमीम

फिर बपा शहर में अफ़रातफ़री कर जाए

आफ़ताब इक़बाल शमीम

नज़र के सामने रहना नज़र नहीं आना

आफ़ताब इक़बाल शमीम

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