नज़र Poetry (page 40)

कुछ कहे जाता था ग़र्क़ अपने ही अफ़्साने में था

शाद अज़ीमाबादी

हज़ार हैफ़ छुटा साथ हम-नशीनों का

शाद अज़ीमाबादी

अब इंतिहा का तिरे ज़िक्र में असर आया

शाद अज़ीमाबादी

किसी की मुंतज़िर अब दिल की रह-गुज़ार नहीं

शबनम वहीद

ज़ौक़-ए-नज़र को इज़्न-ए-नज़ारा न मिल सका

शबनम शकील

उन की शर्मिंदा-ए-एहसान सी हो जाती है

शबनम शकील

मौसम के पास कोई ख़बर मो'तबर भी हो

शबनम शकील

मजबूर हैं पर इतने तो मजबूर भी नहीं

शबनम शकील

हैं मनाज़िर सब बहम-पर्दा नज़र बाक़ी नहीं

शबनम शकील

दोस्तों का ज़िक्र क्या दुश्मन हैं जब बदले हुए

शबनम शकील

मेरे प्यार का क़िस्सा तो हर बस्ती में मशहूर है चाँद

शबनम रूमानी

मैं ने किस शौक़ से इक उम्र ग़ज़ल-ख़्वानी की

शबनम रूमानी

अपनी मजबूरी को हम दीवार-ओ-दर कहने लगे

शबनम रूमानी

तब्सिरा यूँ न मिरे हाल पे इतना होता

शबनम नक़वी

पी रहा है ज़िंदगी की धूप कितने प्यार से

शबनम नक़वी

नज़्म

शबनम अशाई

मय-ए-फ़राग़त का आख़िरी दौर चल रहा था

शब्बीर शाहिद

हद्द-ए-सितम न कर कि ज़माना ख़राब है

शबाब ललित

दूर तक फैला हुआ पानी ही पानी हर तरफ़

शबाब ललित

अन-गिनत शादाब जिस्मों की जवानी पी गया

शबाब ललित

जो थके थके से थे हौसले वो शबाब बन के मचल गए

शायर लखनवी

जो ग़म-ए-हबीब से दूर थे वो ख़ुद अपनी आग में जल गए

शायर लखनवी

हवा को और भी कुछ तेज़ कर गए हैं लोग

शायर लखनवी

इक तबस्सुम से हम ने रोक लिए

शायर लखनवी

समझ में ख़ाक ये जादूगरी नहीं आती

शानुल हक़ हक़्क़ी

निकले तिरी दुनिया के सितम और तरह के

शानुल हक़ हक़्क़ी

असर न हो तो उसी नुत्क़-ए-बे-असर से कह

शानुल हक़ हक़्क़ी

मुद्दत से ढूँडती है किसी की नज़र मुझे

शाद अमृतसरी

ज़ब्त-ए-नावक-ए-ग़म से बात बन तो सकती है

शाद आरफ़ी

उठ गई उस की नज़र मैं जो मुक़ाबिल से उठा

शाद आरफ़ी

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