नज़र Poetry (page 39)
रेग-ए-रवाँ पे नक़्श-ए-कफ़-ए-पा न देखना
शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा
हमारे हाल पे किस दिन जफ़ा नहीं करते
शफ़क़त काज़मी
बेगाना मिले है जब मिले हैं
शफ़क़त काज़मी
दुश्मनी लर्ज़ां है यारो दोस्ती के सामने
शफ़ीउल्लाह राज़
ख़ल्क़-ए-ख़ुदा है शाह की मुख़्बर लगी हुई
शफ़ीक़ सलीमी
मौसम-ए-गुल है न दौर-जाम-ओ-सहबा रह गया
शफ़ीक़ जौनपुरी
कली पर मुस्कुराहट आज भी मालूम होती है
शफ़ीक़ जौनपुरी
कब से इस दुनिया को सरगर्म-ए-सफ़र पाता हूँ मैं
शफ़ीक़ जौनपुरी
दिल टूट चुका तार-ए-नज़र टूट रहा है
शफ़ीक़ देहलवी
मुझे किसी पे मोहब्बत का कुछ गुमाँ सा है
शफ़क़ सुपुरी
मौज-दर-मौज सफ़ीनों से है धारा रौशन
शफ़क़ सुपुरी
मौज-दर-मौज सफ़ीनों से है धारा रौशन
शफ़क़ सुपुरी
ज़बाँ ख़मोश रहे तर्क-ए-मुद्दआ न करे
शायर फतहपुरी
सर-ए-तस्लीम ख़म करना पड़ा तक़्सीर से पहले
शायर फतहपुरी
जो कैफ़-ए-इश्क़ से ख़ाली हो ज़िंदगी किया है
शायर फतहपुरी
गुल-ए-ख़ुश-नुमा के लिबास में कि शुआ-ए-नूर में ढल के आ
शायर फतहपुरी
गुल याद न अमवाज-ए-नसीम-ए-सहरी याद
शायर फतहपुरी
फ़साना-ए-सितम-ए-काएनात कहते हैं
शायर फतहपुरी
सर-ए-बज़्म मेरी नज़र से जब वो निगाह-ए-होश-रुबा मिली
शादाँ इंदौरी
जान जोखिम से किए सर जो मराहिल तू ने
शादाब उल्फ़त
वो मय-परस्त हूँ बदली न जब नज़र आई
शाद लखनवी
टूटे जो दाँत मुँह की शबाहत बिगड़ गई
शाद लखनवी
ना-तवाँ वो हूँ निगाहों में समा ही न सकूँ
शाद लखनवी
मिस्ल-ए-ख़ंजर लेसान रखते हैं
शाद लखनवी
लुंज वो पा-ए-तलब हूँ कहीं जा ही न सकूँ
शाद लखनवी
जिस के हम बीमार हैं ग़म ने उसे भी राँदा है
शाद लखनवी
हर शब ख़याल-ए-ग़ैर के मारे अलग-थलग
शाद लखनवी
देख कर रू-ए-सनम को न बहल जाऊँगा
शाद लखनवी
सियाहकार सियह-रू ख़ता-शिआर आया
शाद अज़ीमाबादी
क्या फ़क़त तालिब-ए-दीदार था मूसा तेरा
शाद अज़ीमाबादी
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