नज़र Poetry (page 41)

जो भी अपनों से उलझता है वो कर क्या लेगा

शाद आरफ़ी

हुदूद-ए-अक्ल-ओ-शर्ब का सवाल ही नहीं रहा

शाद आरफ़ी

अपने जी में जो ठान लेंगे आप

शाद आरफ़ी

अहद-ए-मायूसी जहाँ तक साज़गार आता गया

शाद आरफ़ी

वो जो फ़िरदौस-ए-नज़र है आईना-ख़ाना अभी

सेहर इश्क़ाबादी

जिस से वफ़ा की थी उम्मीद उस ने अदा किया ये हक़

सेहर इश्क़ाबादी

जब सबक़ दे उन्हें आईना ख़ुद-आराई का

सेहर इश्क़ाबादी

फ़रिश्ते भी पहुँच सकते नहीं वो है मकाँ अपना

सेहर इश्क़ाबादी

मुंतशिर जब ज़ेहन में लफ़्ज़ों का शीराज़ा हुआ

सीन शीन आलम

वक़्त ने इक नज़र जो डाली है

सीमान नवेद

अजीब शाम थी जब लौट कर मैं घर आया

सीमान नवेद

कौन दरवाज़ा खुला रखता बराए इंतिज़ार

सीमाब ज़फ़र

फ़िराक़-मौसम के आसमाँ में उजाड़ तारे जुड़े हुए हैं

सीमाब ज़फ़र

फिर आ गया ज़बाँ पे वही नाम क्या करें

सीमाब सुल्तानपुरी

मेहमाँ को घर में आए ज़माना गुज़र गया

सीमाब सुल्तानपुरी

किताब-ए-उम्र में इक वो भी बाब होता है

सीमाब सुल्तानपुरी

मजबूर हूँ गुनाह किए जा रहा हूँ मैं

सीमाब बटालवी

मैं इक शाइ'र हूँ असरार-ए-हक़ीक़त खोल सकता हूँ

सीमाब बटालवी

तुझे दानिस्ता महफ़िल में जो देखा हो तो मुजरिम हूँ

सीमाब अकबराबादी

क्यूँ जाम-ए-शराब-ए-नाब माँगूँ

सीमाब अकबराबादी

जिंदान-ए-काएनात में महसूर कर दिया

सीमाब अकबराबादी

ये दौर-ए-तरक़्क़ी है रिफ़अत का ज़माना है

सीमाब अकबराबादी

शायद जगह नसीब हो उस गुल के हार में

सीमाब अकबराबादी

रस्मन ही उन को नाला-ए-दिल की ख़बर तो हो

सीमाब अकबराबादी

नसीम-ए-सुब्ह गुलशन में गुलों से खेलती होगी

सीमाब अकबराबादी

मुरत्तब हो के इक महशर ग़ुबार-ए-दिल से निकलेगा

सीमाब अकबराबादी

मुझे फ़िक्र-ओ-सर-ए-वफ़ा है हनूज़

सीमाब अकबराबादी

खो कर तिरी गली में दिल-ए-बे-ख़बर को मैं

सीमाब अकबराबादी

कमाल-ए-इलम ओ तहक़ीक़-ए-मुकम्मल का ये हासिल है

सीमाब अकबराबादी

जो मेरे तंगना-ए-दिल में तुझ को जल्वा-गर देखा

सीमाब अकबराबादी

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