नज़र Poetry (page 38)

ये भी शायद तिरा ए'जाज़-ए-नज़र है ऐ दोस्त

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

थी कुछ न ख़ता फिर भी पशेमान रहे हैं

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

शहर-ए-ख़ूबाँ से जो हम अब भी गुज़र आते हैं

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

हम पे जिस तौर भी तुम चाहो नज़र कर देखो

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

चेहरों में नज़र आएँ आँखों में उतर जाएँ

शाहीन ग़ाज़ीपुरी

ज़माना मेरी तबाही पे जो उदास हुआ

शाहीन बद्र

मोहब्बत में न जाने क्यूँ हमें फ़ुर्सत ज़ियादा है

शाहीन अब्बास

मिरे बनने से क्या क्या बन रहा था

शाहीन अब्बास

मौजा-ए-ख़ून-ए-परेशान कहाँ जाता है

शाहीन अब्बास

मौजा-ए-ख़ून-ए-परेशान कहाँ जाता है

शाहीन अब्बास

झगड़े अपने भी हों जब चाक-गरेबानों के

शाहीन अब्बास

दर-ए-इम्काँ से गुज़र कर सर-ए-मंज़र आ कर

शाहीन अब्बास

आँखों से यूँ चराग़ों में डाली है रौशनी

शाहीन अब्बास

किसी आसेब-ज़दा दिल की सदा है क्या है

शाहबाज़ रिज़्वी

था बाम-ए-फ़लक ख़ाक-बसर आने लगा हूँ

शहाब सफ़दर

जब भी कश्ती के मुक़ाबिल भँवर आता है कोई

शहाब सफ़दर

मैं ही मैं बिखरा हुआ हूँ राह-ता-मंज़िल तमाम

शहाब जाफ़री

हयात में भी अजल का समाँ दिखाई दे

शहाब जाफ़री

नहीं है फ़ुर्सत-ए-इक-दम प आह उस को नज़र

शाह नसीर

वाँ कमर बाँधे हैं मिज़्गाँ क़त्ल पर दोनों तरफ़

शाह नसीर

तिरे है ज़ुल्फ़ ओ रुख़ की दीद सुब्ह-ओ-शाम आशिक़ का

शाह नसीर

सदा है इस आह-ओ-चश्म-ए-तर से फ़लक पे बिजली ज़मीं पे बाराँ

शाह नसीर

ख़ाल-ए-रुख़ उस ने दिखाया न दोबारा अपना

शाह नसीर

जब तलक चर्ब न जूँ शम्-ए-ज़बाँ कीजिएगा

शाह नसीर

हरम को शैख़ मत जा है बुत-ए-दिल-ख़्वाह सूरत में

शाह नसीर

इक क़ाफ़िला है बिन तिरे हम-राह सफ़र में

शाह नसीर

दिल को किस सूरत से कीजे चश्म-ए-दिलबर से जुदा

शाह नसीर

देख तू यार-ए-बादा-कश! मैं ने भी काम क्या किया

शाह नसीर

अजब तू ने जल्वा दिखाया मुझे

शाह आसिम

सदियों तुम्हारी याद में शमएँ जलाएँगे

शफ़क़त तनवीर मिर्ज़ा

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