नज़र Poetry (page 36)

तिरी तलाश तो क्या तेरी आस भी न रहे

शहज़ाद अहमद

मुंतज़िर दश्त-ए-दिल-ओ-जाँ है कि आहू आए

शहज़ाद अहमद

मेरी ख़ातिर देर न करना और सफ़र करते जाना

शहज़ाद अहमद

लबों पे आ के रह गईं शिकायतें कभी कभी

शहज़ाद अहमद

कितनी बे-नूर थी दिन भर नज़र-ए-परवाना

शहज़ाद अहमद

ख़ल्क़ ने छीन ली मुझ से मिरी तन्हाई तक

शहज़ाद अहमद

कैसे गुज़र सकेंगे ज़माने बहार के

शहज़ाद अहमद

जो शजर सूख गया है वो हरा कैसे हो

शहज़ाद अहमद

जो दिल में खटकती है कभी कह भी सकोगे

शहज़ाद अहमद

इसी बाइस ज़माना हो गया है उस को घर बैठे

शहज़ाद अहमद

इस भरे शहर में आराम मैं कैसे पाऊँ

शहज़ाद अहमद

हम लोगों को अपने दिल के राज़ बताते रहते हैं

शहज़ाद अहमद

दिल ओ नज़र पे तिरे बाद क्या नहीं गुज़रा

शहज़ाद अहमद

दिल ओ दिमाग़ में एहसास-ए-ग़म उभार दिया

शहज़ाद अहमद

दिल का बुरा नहीं मगर शख़्स अजीब ढब का है

शहज़ाद अहमद

दरिया कभी इक हाल में बहता न रहेगा

शहज़ाद अहमद

बाग़-ए-बहिश्त के मकीं कहते हैं मर्हबा मुझे

शहज़ाद अहमद

अपनी तस्वीर को आँखों से लगाता क्या है

शहज़ाद अहमद

अब न वो शोर न वो शोर मचाने वाले

शहज़ाद अहमद

तन्हाई की ये कौन सी मंज़िल है रफ़ीक़ो

शहरयार

क्या कोई नई बात नज़र आती है हम में

शहरयार

कौन सी बात है जो उस में नहीं

शहरयार

गर्दिश-ए-वक़्त का कितना बड़ा एहसाँ है कि आज

शहरयार

खेल का नतीजा

शहरयार

ज़िंदगी जब भी तिरी बज़्म में लाती है हमें

शहरयार

तुझ से बिछड़े हैं तो अब किस से मिलाती है हमें

शहरयार

तिलिस्म ख़त्म चलो आह-ए-बे-असर का हुआ

शहरयार

सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है

शहरयार

निस्बत रहे तुम से सदा हज़रत निज़ामुद्दीन-जी

शहरयार

दिल में रखता है न पलकों पे बिठाता है मुझे

शहरयार

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