नज़र Poetry (page 34)

कोई भूला हुआ चेहरा नज़र आए शायद

शकेब जलाली

वही झुकी हुई बेलें वही दरीचा था

शकेब जलाली

वहाँ की रौशनियों ने भी ज़ुल्म ढाए बहुत

शकेब जलाली

मौज-ए-ग़म इस लिए शायद नहीं गुज़री सर से

शकेब जलाली

मैं शाख़ से उड़ा था सितारों की आस में

शकेब जलाली

ख़्वाब-ए-गुल-रंग के अंजाम पे रोना आया

शकेब जलाली

ख़िरद फ़रेब-ए-नज़ारों की कोई बात करो

शकेब जलाली

ख़मोशी बोल उठ्ठे हर नज़र पैग़ाम हो जाए

शकेब जलाली

जिस दम क़फ़स में मौसम-ए-गुल की ख़बर गई

शकेब जलाली

हम-जिंस अगर मिले न कोई आसमान पर

शकेब जलाली

ग़म-ए-उल्फ़त मिरे चेहरे से अयाँ क्यूँ न हुआ

शकेब जलाली

ग़म-ए-दिल हीता-ए-तहरीर में आता ही नहीं

शकेब जलाली

दश्त ओ सहरा अगर बसाए हैं

शकेब जलाली

दर्द के मौसम का क्या होगा असर अंजान पर

शकेब जलाली

साथ ग़ुर्बत में कोई ग़ैर न अपना निकला

शकेब बनारसी

झोंका हवा का अध-खुली खिड़की तक आ न जाए

शकेब अयाज़

दाइमी सुख

शाइस्ता मुफ़्ती

अजनबी शहर में उल्फ़त की नज़र को तरसे

शाइस्ता मुफ़्ती

न दिन ही चैन से गुज़रा न कोई रात मिरी

शाइक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

निगाहें जोड़ और आँखें चुरा टुक चल के फिर देखा

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

नहीं है शिकवा अगर वो नज़र नहीं आता

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

मुझे तावीज़ लिख दो ख़ून-ए-आहू से कि ऐ स्यानो

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

मज़हर-ए-हक़ कब नज़र आता है इन शैख़ों के तईं

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

जब से तेरी नज़र पड़ी है झलक

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

आज हमें और ही नज़र आता है कुछ सोहबत का रंग

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

ज़ोर यारो आज हम ने फ़तह की जंग-ए-फ़लक

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

तिरी जो ज़ुल्फ़ का आया ख़याल आँखों में

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

तिरी भुवाँ की तेग़ जब आई नज़र मुझे

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

सच अगर पूछो तो ना-पैदा है यक-रू आश्ना

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

रखता हूँ मैं हक़ पर नज़र कोई कुछ कहो कोई कुछ कहो

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

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