नज़र Poetry (page 35)

न कुछ सितम से तिरे आह आह करता हूँ

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

क्या उस की सिफ़त में गुफ़्तुगू है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

जल्वा-गर फ़ानूस-ए-तन में है हमारा मन चराग़

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

इश्क़ के शहर की कुछ आब-ओ-हवा और ही है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

देखना उस की तजल्ली का जिसे मंज़ूर है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

देख बुनियाद रब की आदम है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

चमन में दहर के हर गुल है कान की सूरत

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

बंदा अगर जहाँ में बजाए ख़ुदा नहीं

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

जान आँखों में रही जी से गुज़रने न दिया

शैख़ अब्दुल लतीफ़ तपिश

अपने ज़ौक़-ए-दीद को अब कारगर पाता हूँ मैं

शैदा अम्बालवी

इस दश्त की वुसअत में सिमट कर नहीं देखा

शहज़ाद क़मर

रदीफ़ क़ाफ़िया बंदिश ख़याल लफ़्ज़-गरी

शहज़ाद क़ैस

शिकस्ता छत में परिंदों को जब ठिकाना मिला

शहज़ाद नय्यर

सोचिए गर उसे हर-नफ़स मौत है कुछ मुदावा भी हो बे-हिसी के लिए

शहज़ाद अंजुम बुरहानी

सोचिए गर उसे हर नफ़स मौत है कुछ मुदावा भी हो बे-हिसी के लिए

शहज़ाद अंजुम बुरहानी

यूँ तो हम अहल-ए-नज़र हैं मगर अंजाम ये है

शहज़ाद अहमद

वाक़िआ कुछ भी हो सच कहने में रुस्वाई है

शहज़ाद अहमद

तीरगी ही तीरगी हद्द-ए-नज़र तक तीरगी

शहज़ाद अहमद

लोग ज़िंदा नज़र आते थे मगर थे मक़्तूल

शहज़ाद अहमद

इस राह से गुज़रे थे कभी अहल-ए-नज़र भी

शहज़ाद अहमद

इस आस पे सैलाब के सीने पे रवाँ हूँ

शहज़ाद अहमद

हमारे पेश-ए-नज़र मंज़िलें कुछ और भी थीं

शहज़ाद अहमद

दिल पर भी आओ एक नज़र डालते चलें

शहज़ाद अहमद

भरपूर नहीं हैं किसी चेहरे के ख़द-ओ-ख़ाल

शहज़ाद अहमद

आँखें न खुलें नूर के सैलाब में मेरी

शहज़ाद अहमद

आँख उठा के मेरी सम्त अहल-ए-नज़र न देख पाए

शहज़ाद अहमद

हम कि इंसान नहीं आँखें हैं

शहज़ाद अहमद

दरख़्तों पर कोई पत्ता नहीं था

शहज़ाद अहमद

ये न हो वो भूलने वाला भुला देना पड़े

शहज़ाद अहमद

ये भी सच है कि नहीं है कोई रिश्ता तुझ से

शहज़ाद अहमद

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