उम्र Poetry (page 53)

ज़ंजीर से उठती है सदा सहमी हुई सी

अर्श सिद्दीक़ी

वक़्त का झोंका जो सब पत्ते उड़ा कर ले गया

अर्श सिद्दीक़ी

फिर हुनर-मंदों के घर से बे-बुनर जाता हूँ मैं

अर्श सिद्दीक़ी

हैराँ हूँ कि ये कौन सा दस्तूर-ए-वफ़ा है

अर्श सिद्दीक़ी

बस एक ही कैफ़िय्यत-ए-दिल सुब्ह-ओ-मसा है

अर्श सिद्दीक़ी

नफ़स की आमद-ओ-शुद को वबाल कर के भी

आरिफ़ इमाम

हवस-परस्ती ओ ग़ारत-गरी की लत न गई

अक़ील शादाब

अब तिरे हिज्र में यूँ उम्र बसर होती है

अनवापुल हसन अनवार

सच है उम्र भर किस का कौन साथ देता है

अनवर शऊर

गो कठिन है तय करना उम्र का सफ़र तन्हा

अनवर शऊर

टूटा तिलिस्म-ए-वक़्त तो क्या देखता हूँ मैं

अनवर शऊर

शक नहीं है हमें उस बुत के ख़ुदा होने में

अनवर शऊर

गो कठिन है तय करना उम्र का सफ़र तन्हा

अनवर शऊर

और न दर-ब-दर फिरा और न आज़मा मुझे

अनवर शऊर

वो पर्दे से निकल कर सामने जब बे-हिजाब आया

अनवर सहारनपुरी

दीवार पर लिखा न पढ़ो और ख़ुश रहो

अनवर सदीद

आरज़ू ने जिस की पोरों तक था सहलाया मुझे

अनवर सदीद

वो नीची निगाहें वो हया याद रहेगी

अनवर साबरी

इश्क़ में ग़म के सिवा कोई ख़ुशी देखी नहीं

अनवर साबरी

अता-ए-ग़म पे भी ख़ुश हूँ मिरी ख़ुशी क्या है

अनवर साबरी

जो बारिशों में जले तुंद आँधियों में जले

अनवर मसूद

बस अब तर्क-ए-तअल्लुक़ के बहुत पहलू निकलते हैं

अनवर मसूद

सभी के अपने मसाइल सभी की अपनी अना

अनवर जलालपुरी

शादाब-ओ-शगुफ़्ता कोई गुलशन न मिलेगा

अनवर जलालपुरी

क़याम-गाह न कोई न कोई घर मेरा

अनवर जलालपुरी

ये नर्म हाथ मरे हाथ में थमा दीजे

अनवर अंजुम

हुए असीर तो फिर उम्र भर रिहा न हुए

अनवर महमूद खालिद

ख़ुदा भी मेरी तरह बा-कमाल ऐसा था

अनवर महमूद खालिद

दिमाग़ उन के तजस्सुस में जिस्म घर में रहा

अंजुम सिद्दीक़ी

हम बे-वतन ख़्वाबों के जोलाहे हैं

अंजुम सलीमी

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