करीब Poetry (page 6)

ख़िरद के जुमला दसातीर से मुकरते हुए

सीमाब ज़फ़र

क़फ़स की तीलियों में जाने क्या तरकीब रक्खी है

सीमाब अकबराबादी

मरकज़ पे अपने धूप सिमटती है जिस तरह

सीमाब अकबराबादी

ये किस ने शाख़-ए-गुल ला कर क़रीब-ए-आशियाँ रख दी

सीमाब अकबराबादी

चमक जुगनू की बर्क़-ए-बे-अमाँ मालूम होती है

सीमाब अकबराबादी

जिस्म-ए-बे-सर कोई बिस्मिल कोई फ़रियादी था

सय्यद जहीरुद्दीन ज़हीर

शम्अ' रौशन कोई कर दे मिरे ग़म-ख़ाने में

सय्यद एजाज़ अहमद रिज़वी

जो दूर से हमें अक्सर ख़ुदा सा लगता है

सत्य नन्द जावा

अजाइब-ख़ाना

सरवत ज़ेहरा

देखा जो उस तरफ़ तो बदन पर नज़र गई

सरवत हुसैन

पाते रहे ये फ़ैज़ तिरी बे-रुख़ी से हम

सरताज आलम आबिदी

बला से नाम वो मेरा उछाल देता है

सरफ़राज़ नवाज़

चराग़ जब मेरा कमरा नापता है

सारा शगुफ़्ता

मैं किसी जवाज़ के हिसार में न था

साक़ी फ़ारुक़ी

करनी नहीं है दुनिया में इक दुश्मनी मुझे

संजीव आर्या

हम रूह-ए-काएनात हैं नक़्श-ए-असास हैं

समद अंसारी

मिरी रौशनी तिरे ख़द्द-ओ-ख़ाल से मुख़्तलिफ़ तो नहीं मगर

सलीम कौसर

मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है

सलीम कौसर

लौ को छूने की हवस में एक चेहरा जल गया

सलीम कौसर

बहुत क़रीब से कुछ भी न देख पाओगे

सलीम फ़ौज़

सुकूत बढ़ने लगा है सदा ज़रूरी है

सलीम फ़ौज़

किस ने कहा कि मुझ को ये दुनिया नहीं पसंद

सलीम फ़राज़

नींद से पहले

सलीम अहमद

मैं सर छुपाऊँ कहाँ साया-ए-नज़र के बग़ैर

सलीम अहमद

जो बात दिल में थी वो कब ज़बान पर आई

सलीम अहमद

ज़िंदगी

सलाम मछली शहरी

रुख़-ए-रौशन दिखाइए साहब

सख़ी लख़नवी

वो घिर के आया घटाओं की तीरगी की तरह

सज्जाद बाक़र रिज़वी

बे-दिली वो है कि मरने की तमन्ना भी नहीं

सज्जाद बाक़र रिज़वी

मैं चाहता हूँ कि हर शय यहाँ सँवर जाए

साजिद हमीद

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