हत्या Poetry (page 11)

हर अदा मश्कूक तेरी मुश्तबा हर बात है

चूँचाल सियालकोटी

जीने वाला ये समझता नहीं सौदाई है

बिस्मिल इलाहाबादी

बदन पे ज़ख़्म सजाए लहू लबादा किया

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

फिर आई फ़स्ल-ए-गुल फिर ज़ख़्म-ए-दिल रह रह के पकते हैं

भारतेंदु हरिश्चंद्र

बुत-ए-काफ़िर जो तू मुझ से ख़फ़ा है

भारतेंदु हरिश्चंद्र

आज मक़्तल में ख़बर है कि चराग़ाँ होगा

बेताब सूरी

दोनों ही की जानिब से हो गर अहद-ए-वफ़ा हो

बेख़ुद देहलवी

दिल चुरा ले गई दुज़्दीदा-नज़र देख लिया

बेख़ुद देहलवी

बेताब रहें हिज्र में कुछ दिल तो नहीं हम

बेख़ुद देहलवी

बेचने आए कोई क्या दिल-ए-शैदा ले कर

बेख़ुद देहलवी

वो मेरे क़त्ल का मुल्ज़िम है लोग कहते हैं

बेकल उत्साही

तो पहले मेरा ही हाल-ए-तबाह लिख लीजे

बेकल उत्साही

नए ज़माने में अब ये कमाल होने लगा

बेकल उत्साही

रहने दे रतजगों में परेशाँ मज़ीद उसे

बेदिल हैदरी

मुझ से छुप कर मिरे अरमानों को बर्बाद न कर

बेदम शाह वारसी

सुब्ह क़यामत आएगी कोई न कह सका कि यूँ

बयान मेरठी

ये ज़र्द पत्तों की बारिश मिरा ज़वाल नहीं

बशीर बद्र

असर ज़ुल्फ़ का बरमला हो गया

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

जब मेरे दिल जिगर की तिलिस्में बनाइयाँ

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

शायद

बलराज कोमल

गिर्या-ए-सगाँ

बलराज कोमल

उसी के ज़ुल्म से मैं हालत-ए-पनाह में था

बख़्श लाइलपूरी

मेरे सुर्ख़ लहू से चमकी कितने हाथों में मेहंदी

ज़फ़र

जिगर के टुकड़े हुए जल के दिल कबाब हुआ

ज़फ़र

जब कि पहलू में हमारे बुत-ए-ख़ुद-काम न हो

ज़फ़र

जब कभी दरिया में होते साया-अफ़गन आप हैं

ज़फ़र

ख़बर शाकी है

बद्र वास्ती

ग़रीब शहर

अज़ीज़ क़ैसी

उलझाओ का मज़ा भी तिरी बात ही में था

अज़ीज़ क़ैसी

सर-ए-सहरा-ए-जाँ हम चाक-दामानी भी करते हैं

अज़ीज़ नबील

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