रंग Poetry (page 59)

बिखर रहे थे हर इक सम्त काएनात के रंग

फ़ातिमा हसन

आँखों में न ज़ुल्फ़ों में न रुख़्सार में देखें

फ़ातिमा हसन

उस की दीवार पे मनक़ूश है वो हर्फ़-ए-वफ़ा

फ़सीह अकमल

कीसा-ए-गुल में बंद थी ख़ुशबू

फ़रताश सय्यद

होश ओ ख़िरद गँवा के तिरे इंतिज़ार में

फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी

दयार-ए-फ़िक्र-ओ-हुनर को निखारने वाला

फ़र्रुख़ ज़ोहरा गिलानी

ग़ज़लों में अब वो रंग न रानाई रह गई

फ़ारूक़ शमीम

वो अलग चुप है ख़ुद से शर्मा कर

फ़ारूक़ शफ़क़

बहुत धोका किया ख़ुद को मगर क्या कर लिया मैं ने

फ़ारूक़ शफ़क़

आँधियों का ख़्वाब अधूरा रह गया

फ़ारूक़ शफ़क़

अजीब रंग सा चेहरों पे बे-कसी का है

फ़ारूक़ नाज़की

सब्ज़ आग़ाज़ से सुर्ख़ अंजाम तक

फ़ारूक़ मुज़्तर

नक़्श आख़िर आप अपना हादिसा हो जाएगा

फ़ारूक़ मुज़्तर

न पानियों का इज़्तिरार शहर में

फ़ारूक़ मुज़्तर

मगर इन आँखों में किस सुब्ह के हवाले थे

फ़ारूक़ मुज़्तर

आँखों में मौज मौज कोई सोचने लगा

फ़ारूक़ मुज़्तर

कभी आओ

फ़ारूक़ बख़्शी

महकते लफ़्ज़ों में शामिल है रंग-ओ-बू किस की

फ़ारूक़ बख़्शी

न-जाने कितने लहजे और कितने रंग बदलेगा

फ़ारूक़ अंजुम

ख़ाली नहीं है कोई यहाँ पर अज़ाब से

फ़ारूक़ अंजुम

मचलती है मिरे सीने में तेरी आरज़ू क्या क्या

फ़रोग़ हैदराबादी

तुम्हारे रंग फीके पड़ गए नाँ?

फरीहा नक़वी

मैं शाम से शायद डूबी थी

फरीहा नक़वी

एक पुराना ख़्वाब

फरीहा नक़वी

जितने थे तेरे महके हुए आँचलों के रंग

फ़ारिग़ बुख़ारी

वो रोज़-ओ-शब भी नहीं हैं वो रंग-ओ-बू भी नहीं

फ़ारिग़ बुख़ारी

वो रोज़-ओ-शब भी नहीं है वो रंग-ओ-बू भी नहीं

फ़ारिग़ बुख़ारी

वो रौशनी है कहाँ जिस के बाद साया नहीं

फ़ारिग़ बुख़ारी

रंग-दर-रंग हिजाबात उठाने होंगे

फ़ारिग़ बुख़ारी

क्या अदू क्या दोस्त सब को भा गईं रुस्वाइयाँ

फ़ारिग़ बुख़ारी

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