प्रकाश Poetry (page 10)

इस बुत-कदे में तू जो हसीं-तर लगा मुझे

शकेब जलाली

हम-जिंस अगर मिले न कोई आसमान पर

शकेब जलाली

दश्त ओ सहरा अगर बसाए हैं

शकेब जलाली

बे-आब-ओ-बे-ग्याह हुआ उस को छोड़ कर

शकेब अयाज़

जिस ने भी दास्ताँ लिखी होगी

शाइस्ता यूसुफ़

कब सुनी तुम ने रागनी मेरी

शाइस्ता सहर

आरिज़ से उस के ज़ुल्फ़ में क्यूँ-कर है रौशनी

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

दर्द-ए-दिल मेरी आह से पूछो

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम

रदीफ़ क़ाफ़िया बंदिश ख़याल लफ़्ज़-गरी

शहज़ाद क़ैस

सोचिए गर उसे हर-नफ़स मौत है कुछ मुदावा भी हो बे-हिसी के लिए

शहज़ाद अंजुम बुरहानी

सोचिए गर उसे हर नफ़स मौत है कुछ मुदावा भी हो बे-हिसी के लिए

शहज़ाद अंजुम बुरहानी

वो मिरी सुब्हों का तारा वो मिरी रातों का चाँद

शहज़ाद अहमद

वीरान तो नहीं शब-ए-तारीक की फ़ज़ा

शहज़ाद अहमद

हर तरफ़ फैली हुई थी रौशनी ही रौशनी

शहज़ाद अहमद

आँखें न खुलें नूर के सैलाब में मेरी

शहज़ाद अहमद

जीने मरने के दरमियान एक साअत

शहज़ाद अहमद

दरख़्तों पर कोई पत्ता नहीं था

शहज़ाद अहमद

वो जा चुका है तो क्यूँ बे-क़रार इतने हो

शहज़ाद अहमद

सुकून कुछ तो मिला दिल का माजरा लिख कर

शहज़ाद अहमद

ख़ुद ही मिल बैठे हो ये कैसी शनासाई हुई

शहज़ाद अहमद

ख़िज़ाँ जब आए तो आँखों में ख़ाक डालता हूँ

शहज़ाद अहमद

जब आफ़्ताब न निकला तो रौशनी के लिए

शहज़ाद अहमद

इस दौर-ए-बे-दिली में कोई बात कैसे हो

शहज़ाद अहमद

दिल-ए-फ़सुर्दा उसे क्यूँ गले लगा न लिया

शहज़ाद अहमद

अब निभानी ही पड़ेगी दोस्ती जैसी भी है

शहज़ाद अहमद

ये इक शजर कि जिस पे न काँटा न फूल है

शहरयार

जहाँ पे तेरी कमी भी न हो सके महसूस

शहरयार

मुनकिर-ए-हक़

शहराम सर्मदी

अहल-ए-दिल को बुला रहा हूँ

शहराम सर्मदी

वो सामने हों मिरे और नज़र झुकी न रहे

शहनाज़ मुज़म्मिल

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