सबसे Poetry (page 11)

चार उंसुर के सब तमाशे हैं

वज़ीर अली सबा लखनवी

दिल-ए-पुर दाग़ बाग़ किस का है

वज़ीर अली सबा लखनवी

दिल है ग़िज़ा-ए-रंज जिगर है ग़िज़ा-ए-रंज

वज़ीर अली सबा लखनवी

बुत-परस्ती से न तीनत मिरी ज़िन्हार फिरी

वज़ीर अली सबा लखनवी

ऐ सनम सब हैं तिरे हाथों से नालाँ आज-कल

वज़ीर अली सबा लखनवी

तुम जो आते हो

वज़ीर आग़ा

तर्ग़ीब

वज़ीर आग़ा

पीपल

वज़ीर आग़ा

इक बे-अंत वजूद

वज़ीर आग़ा

दुख मैले आकाश का

वज़ीर आग़ा

भूत

वज़ीर आग़ा

बंधन

वज़ीर आग़ा

सहर ने आ कर मुझे सुलाया तो मैं ने जाना

वज़ीर आग़ा

जबीं-ए-संग पे लिक्खा मिरा फ़साना गया

वज़ीर आग़ा

चलो माना हमीं बे-कारवाँ हैं

वज़ीर आग़ा

बाज़ औक़ात फ़राग़त में इक ऐसा लम्हा आता है

वसीम ताशिफ़

लगता है जुदा सब से किरदार 'वसीम' उस का

वसीम मलिक

मफ़रूर कभी ख़ुद पर शर्मिंदा नज़र आए

वसीम मलिक

हम-सफ़र तू ने परों को जो मिरे काटा है

वसीम मलिक

मोहब्बत में बिछड़ने का हुनर सब को नहीं आता

वसीम बरेलवी

ये है तो सब के लिए हो ये ज़िद हमारी है

वसीम बरेलवी

वो मेरे घर नहीं आता मैं उस के घर नहीं जाता

वसीम बरेलवी

वो मेरे बालों में यूँ उँगलियाँ फिराता था

वसीम बरेलवी

शाम तक सुब्ह की नज़रों से उतर जाते हैं

वसीम बरेलवी

मेरा किया था मैं टूटा कि बिखरा रहा

वसीम बरेलवी

मैं इस उमीद पे डूबा कि तू बचा लेगा

वसीम बरेलवी

मैं अपने ख़्वाब से बिछड़ा नज़र नहीं आता

वसीम बरेलवी

ख़ुशी का साथ मिला भी तो दिल पे बार रहा

वसीम बरेलवी

हवेलियों में मिरी तर्बियत नहीं होती

वसीम बरेलवी

दूर से ही बस दरिया दरिया लगता है

वसीम बरेलवी

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