सबसे Poetry (page 13)

बाद-ए-बहार में सब आतिश जुनून की है

वली उज़लत

यार उठ गए दुनिया से अग़्यार की बारी है

वली उज़लत

तीरा-बख़्तों को करे है नाला-ए-ग़मगीं ख़राब

वली उज़लत

तीरा-बख़्तों को करे है नाला-ए-ग़मगीं ख़राब

वली उज़लत

ख़ुनुक-जोशी न करते जूँ सबा गर ये बुताँ हम से

वली उज़लत

ख़त ने आ कर की है शायद रहम फ़रमाने की अर्ज़

वली उज़लत

जिन दिनों हम उस शब-ए-हज़ के सियह-कारों में थे

वली उज़लत

फ़स्ल-ए-गुल में नईं बघूले उठते वीरानों के बीच

वली उज़लत

मुफ़लिसी सब बहार खोती है

वली मोहम्मद वली

किशन की गोपियाँ की नईं है ये नस्ल

वली मोहम्मद वली

मुफ़्लिसी सब बहार खोती है

वली मोहम्मद वली

मत ग़ुस्से के शो'ले सूँ जलते कूँ जलाती जा

वली मोहम्मद वली

मैं आशिक़ी में तब सूँ अफ़्साना हो रहा हूँ

वली मोहम्मद वली

ख़ूब-रू ख़ूब काम करते हैं

वली मोहम्मद वली

भड़के है दिल की आतिश तुझ नेह की हवा सूँ

वली मोहम्मद वली

अगर गुलशन तरफ़ वो नौ-ख़त-ए-रंगीं-अदा निकले

वली मोहम्मद वली

सफ़र है ख़त्म मगर बे-घरी न जाएगी

वली आलम शाहीन

मुसल्ला रखते हैं सहबा-ओ-जाम रखते हैं

वाली आसी

मौज-ए-हवा आब-ए-रवाँ और ये ज़मीन ओ आसमाँ

वाली आसी

हमें तेरे सिवा इस दुनिया में किसी और से क्या लेना-देना

वाली आसी

वो सूरतें जो बड़ी शोख़ हैं सजीली हैं

वाली आसी

तुझ से बिछड़ के यूँ तो बहुत जी उदास है

वाली आसी

मैं जब छोटा सा था काग़ज़ पे ये मंज़र बनाता था

वाली आसी

हम अपने-आप पे भी ज़ाहिर कभी दिल का हाल नहीं करते

वाली आसी

आरज़ू ले के कोई घर से निकलते क्यूँ हो

वाली आसी

मैं नाम-लेवा हूँ तेरा तू मो'तबर कर दे

वकील अख़्तर

ज़ोहरा सुहैल शम्स ख़ुर बद्र बहा तू कौन है

वाजिद अली शाह अख़्तर

सहे ग़म पए रफ़्तगाँ कैसे कैसे

वाजिद अली शाह अख़्तर

कभी लुत्फ़-ए-ज़बान-ए-ख़ुश-बयाँ थे

वाजिद अली शाह अख़्तर

अल्लाह ऐ बुतो हमें दिखलाए लखनऊ

वाजिद अली शाह अख़्तर

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