सबसे Poetry (page 12)

अंधेरा ज़ेहन का सम्त-ए-सफ़र जब खोने लगता है

वसीम बरेलवी

देख उसे सब ज़िक्र हमारा करते हैं

वसीम अकरम

जब से मैं ने इश्क़ का पैराहन पहना है

वसीम अकरम

लहू लहू सा दिल-ए-दाग़-दार ले के चले

वाक़िफ़ राय बरेलवी

सदा-ए-आफ़रीं उट्ठी थी जस्त ऐसी थी

वक़ार वासिक़ी

मुदावा

वामिक़ जौनपुरी

माँ

वामिक़ जौनपुरी

भूका बंगाल

वामिक़ जौनपुरी

वो तन्हा मेरे ही दरपय नहीं है

वामिक़ जौनपुरी

जो दश्त ख़्वाबों में अक्सर दिखाई देता है

वामिक़ जौनपुरी

हो रही है दर-ब-दर ऐसी जबीं-साई कि बस

वामिक़ जौनपुरी

हमारे मय-कदे का अब निज़ाम बदलेगा

वामिक़ जौनपुरी

दीवाने दीवाने ठहरे खेल गए अँगारों से

वामिक़ जौनपुरी

दिल के वीराने को यूँ आबाद कर लेते हैं हम

वामिक़ जौनपुरी

कभी जब दास्तान-ए-गर्दिश-ए-अय्याम लिखता हूँ

वलीउल्लाह वली

आप की नज़रों में शायद इस लिए अच्छा हूँ मैं

वलीउल्लाह वली

इश्क़ जब दख़्ल करे है दिल-ए-इंसाँ में 'मुहिब'

वलीउल्लाह मुहिब

दैर में का'बे में मयख़ाने में और मस्जिद में

वलीउल्लाह मुहिब

बे-इश्क़ जितनी ख़ल्क़ है इंसाँ की शक्ल में

वलीउल्लाह मुहिब

वाँ जो कुछ का'बे में असरार है अल्लाह अल्लाह

वलीउल्लाह मुहिब

उस बुत ने गुलाबी जो उठा मुँह से लगाई

वलीउल्लाह मुहिब

मोहब्बत से तरीक़-ए-दोस्ती से चाह से माँगो

वलीउल्लाह मुहिब

जो मरीज़ इश्क़ के हैं उन को शिफ़ा है कि नहीं

वलीउल्लाह मुहिब

जी चाहे का'बे जाओ जी चाहे बुत को पूजो

वलीउल्लाह मुहिब

हर आन यास बढ़नी हर दम उमीद घटनी

वलीउल्लाह मुहिब

है मिरे पहलू में और मुझ को नज़र आता नहीं

वलीउल्लाह मुहिब

देखा जो कुछ जहाँ में कोई दम ये सब नहीं

वलीउल्लाह मुहिब

अश्क-बारी का मिरी आँखों ने ये बाँधा है झाड़

वलीउल्लाह मुहिब

कुछ ग़ौर का जौहर नहीं ख़ुद-फ़हमी में हैराँ हैं

वली उज़लत

गए सब मर्द रह गए रहज़न अब उल्फ़त से कामिल हूँ

वली उज़लत

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