सबसे Poetry (page 25)

साक़ी-ए-दौराँ कहाँ वो तेरे मय-ख़ाने गए

शिव चरन दास गोयल ज़ब्त

अजब क्या है जो नौ-ख़ेज़ों ने सब से पहले जानें दीं

शिबली नोमानी

उलमा-ए-ज़िंदानी

शिबली नोमानी

अदल-ए-फ़ारूक़ी का एक नमूना

शिबली नोमानी

असर के पीछे दिल-ए-हज़ीं ने निशान छोड़ा न फिर कहीं का

शिबली नोमानी

वो झंकार पैदा है तार-ए-नफ़स में

शेर सिंह नाज़ देहलवी

याँ लब पे लाख लाख सुख़न इज़्तिराब में

ज़ौक़

तुम भूल कर भी याद नहीं करते हो कभी

ज़ौक़

तू जान है हमारी और जान है तो सब कुछ

ज़ौक़

तेरे आफ़त-ज़दा जिन दश्तों में अड़ जाते हैं

ज़ौक़

निगह का वार था दिल पर फड़कने जान लगी

ज़ौक़

नहीं सबात बुलंदी-ए-इज्ज़-ओ-शाँ के लिए

ज़ौक़

मिरे सीने से तेरा तीर जब ऐ जंग-जू निकला

ज़ौक़

ख़ूब रोका शिकायतों से मुझे

ज़ौक़

कल गए थे तुम जिसे बीमार-ए-हिज्राँ छोड़ कर

ज़ौक़

जुदा हों यार से हम और न हो रक़ीब जुदा

ज़ौक़

जो कुछ कि है दुनिया में वो इंसाँ के लिए है

ज़ौक़

जब चला वो मुझ को बिस्मिल ख़ूँ में ग़लताँ छोड़ कर

ज़ौक़

गईं यारों से वो अगली मुलाक़ातों की सब रस्में

ज़ौक़

दूद-ए-दिल से है ये तारीकी मिरे ग़म-ख़ाना में

ज़ौक़

दिखला न ख़ाल-ए-नाफ़ तू ऐ गुल-बदन मुझे

ज़ौक़

चुपके चुपके ग़म का खाना कोई हम से सीख जाए

ज़ौक़

बलाएँ आँखों से उन की मुदाम लेते हैं

ज़ौक़

बादाम दो जो भेजे हैं बटवे में डाल कर

ज़ौक़

न कहो ए'तिबार है किस का

शैख़ अली बख़्श बीमार

दख़्ल हर दिल में तिरा मिस्ल-ए-सुवैदा हो गया

शैख़ अली बख़्श बीमार

बुतो ये शीशा-ए-दिल तोड़ दो ख़ुदा के लिए

शैख़ अली बख़्श बीमार

मुझ को ज़िंदा रहने का इक जज़्बा आ के मार गया

शहज़ाद रज़ा लम्स

उस की बातें क्या करते हो वो लफ़्ज़ों का बानी था

शहपर रसूल

मेरी नज़र का मुद्दआ उस के सिवा कुछ भी नहीं

शहपर रसूल

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