सबसे Poetry (page 26)
मस्लहत के ज़ावियों से किस क़दर अंजान है
शहपर रसूल
कोई साया न कोई हम-साया
शहपर रसूल
हम ज़िंदगी-शनास थे सब से जुदा रहे
शहपर रसूल
एक दिन न रोने का फ़ैसला किया मैं ने
शहपर रसूल
दिल में शोला था सो आँखों में नमी बनता गया
शहपर रसूल
रक़ाबतों की तरह से हम ने मोहब्बतें बे-मिसाल की हैं
शीश मोहम्मद इस्माईल आज़मी
गिरता हुआ दरख़्त
शीरीं अहमद
यादों की रुत के आते ही सब हो गए हरे
शीन काफ़ निज़ाम
बीच का बढ़ता हुआ हर फ़ासला ले जाएगा
शीन काफ़ निज़ाम
पुरखों से जो मिली है वो दौलत भी ले न जाए
शीन काफ़ निज़ाम
मौज-ए-हवा से फूलों के चेहरे उतर गए
शीन काफ़ निज़ाम
इक साएँ साएँ घेरे है गिरते मकान को
शीन काफ़ निज़ाम
छीन कर वो लज़्ज़त-ए-सौत-ओ-सदा ले जाएगा
शीन काफ़ निज़ाम
उन से मिलते थे तो सब कहते थे क्यूँ मिलते हो
शाज़ तमकनत
ज़मीं का क़र्ज़
शाज़ तमकनत
संग-आबाद की एक दुकाँ
शाज़ तमकनत
छटा आदमी
शाज़ तमकनत
यही सफ़र की तमन्ना यही थकन की पुकार
शाज़ तमकनत
सिमट सिमट सी गई थी ज़मीं किधर जाता
शाज़ तमकनत
नफ़स नफ़स है तिरे ग़म से चूर चूर अब तक
शाज़ तमकनत
शाम के ढलते सूरज ने ये बात मुझे समझाई है
शायान क़ुरैशी
सब्र-ओ-क़रार टूट गया इज़्तिराब से
शायान क़ुरैशी
हज़ारों मुश्किलें हैं और लाखों ग़म लिए हैं हम
शायान क़ुरैशी
बिखरी थी हर सम्त जवानी रात घनेरी होने तक
शायान क़ुरैशी
बात हो दैर-ओ-हरम की या वतन की बात हो
शायान क़ुरैशी
तेरी सी भी आफ़त कोई ऐ सोज़िश-ए-तब है
शौक़ क़िदवाई
दिल मिरा टूटा तो उस को कुछ मलाल आ ही गया
शौक़ क़िदवाई
दिल खोटा है हम को उस से राज़-ए-इश्क़ न कहना था
शौक़ क़िदवाई
तर्क-ए-लज़्ज़ात पे माइल जो ब-ज़ाहिर है मिज़ाज
शौक़ बहराइची
नई बज़्म-ए-ऐश-ओ-नशात में ये मरज़ सुना है कि आम है
शौक़ बहराइची
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