सबसे Poetry (page 83)

ख़िर्क़ा-पोशी में ख़ुद-नुमाई है

दाऊद औरंगाबादी

जब वो मह-ए-रुख़्सार यकायक नज़र आया

दाऊद औरंगाबादी

सामने जो कहा नहीं होता

दरवेश भारती

'दर्द' कुछ मालूम है ये लोग सब

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

तोहमत-ए-चंद अपने ज़िम्मे धर चले

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

मिरा जी है जब तक तिरी जुस्तुजू है

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

हम तुझ से किस हवस की फ़लक जुस्तुजू करें

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

बाग़-ए-जहाँ के गुल हैं या ख़ार हैं तो हम हैं

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

तमन्ना का दूसरा क़दम

दानियाल तरीर

साकित हो मगर सब को रवानी नज़र आए

दानियाल तरीर

एक बुझाओ एक जलाओ ख़्वाब का क्या है

दानियाल तरीर

न सोचें अहल-ए-ख़िरद मुझ को आज़माने को

दानिश फ़राही

सबक़ ऐसा पढ़ा दिया तू ने

दाग़ देहलवी

चाह की चितवन में आँख उस की शरमाई हुई

दाग़ देहलवी

उस से क्या ख़ाक हम-नशीं बनती

दाग़ देहलवी

तुम आईना ही न हर बार देखते जाओ

दाग़ देहलवी

तमाशा-ए-दैर-ओ-हरम देखते हैं

दाग़ देहलवी

शब-ए-वस्ल भी लब पे आए गए हैं

दाग़ देहलवी

सब लोग जिधर वो हैं उधर देख रहे हैं

दाग़ देहलवी

पुकारती है ख़मोशी मिरी फ़ुग़ाँ की तरह

दाग़ देहलवी

फिरे राह से वो यहाँ आते आते

दाग़ देहलवी

फिर शब-ए-ग़म ने मुझे शक्ल दिखाई क्यूँकर

दाग़ देहलवी

ना-रवा कहिए ना-सज़ा कहिए

दाग़ देहलवी

मोहब्बत में आराम सब चाहते हैं

दाग़ देहलवी

मोहब्बत का असर जाता कहाँ है

दाग़ देहलवी

मिन्नतों से भी न वो हूर-शमाइल आया

दाग़ देहलवी

मज़े इश्क़ के कुछ वही जानते हैं

दाग़ देहलवी

कौन सा ताइर-ए-गुम-गश्ता उसे याद आया

दाग़ देहलवी

काबे की है हवस कभी कू-ए-बुताँ की है

दाग़ देहलवी

हाथ निकले अपने दोनों काम के

दाग़ देहलवी

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