सदा Poetry (page 39)

चले थे यार बड़े ज़ोम में हवा की तरह

अहमद फ़राज़

लगता है कि इस दिल में कोई क़ैद है 'अश्फ़ाक़'

अहमद अशफ़ाक़

सब जल गया जलते हुए ख़्वाबों के असर से

अहमद अशफ़ाक़

मैं हर्फ़-ए-इब्तिदा हूँ

आग़ाज़ बरनी

तीर-ए-नज़र से छिद के दिल-अफ़गार ही रहा

आग़ा हज्जू शरफ़

तिरी हवस में जो दिल से पूछा निकल के घर से किधर को चलिए

आग़ा हज्जू शरफ़

सन्नाटे का आलम क़ब्र में है है ख़्वाब-ए-अदम आराम नहीं

आग़ा हज्जू शरफ़

नाहक़ ओ हक़ का उन्हें ख़ौफ़-ओ-ख़तर कुछ भी नहीं

आग़ा हज्जू शरफ़

जश्न था ऐश-ओ-तरब की इंतिहा थी मैं न था

आग़ा हज्जू शरफ़

इश्क़-ए-दहन में गुज़री है क्या कुछ न पूछिए

आग़ा हज्जू शरफ़

मैं फ़क़त इस जुर्म में दुनिया में रुस्वा हो गया

अफ़ज़ल मिनहास

काँच की ज़ंजीर टूटी तो सदा भी आएगी

अफ़ज़ल मिनहास

गुम-सुम हवा के पेड़ से लिपटा हुआ हूँ में

अफ़ज़ल मिनहास

कोई अच्छी सी ग़ज़ल कानों में मेरे घोल दे

आफ़ताब शम्सी

कहीं सोता न रह जाऊँ सदा दे कर जगाओ ना

आफ़ताब इक़बाल शमीम

मुझ को मंज़र के सिले में वो सदा भेजता है

आफ़ताब अहमद शाह

उम्र-ए-रफ़्ता मैं तिरे हाथ भी क्या आया हूँ

आफ़ताब अहमद

ज़ुल्मात

अफ़रोज़ आलम

मौज-दर-मौज हवाओं से बचा लाऊँगा

अफ़रोज़ आलम

हश्र की सुब्ह दरख़्शाँ हो मक़ाम-ए-महमूद

आदिल मंसूरी

फ़ैज़

आदिल मंसूरी

कौन था वो ख़्वाब के मल्बूस में लिपटा हुआ

आदिल मंसूरी

जो चीज़ थी कमरे में वो बे-रब्त पड़ी थी

आदिल मंसूरी

होने को यूँ तो शहर में अपना मकान था

आदिल मंसूरी

घूम रहा था एक शख़्स रात के ख़ारज़ार में

आदिल मंसूरी

सुकून-ए-दिल फ़ना है और मैं हूँ

आदिल हयात

शोर सा एक हर इक सम्त बपा लगता है

अदीम हाशमी

तमाम उम्र की तन्हाई की सज़ा दे कर

अदीम हाशमी

शोर सा एक हर इक सम्त बपा लगता है

अदीम हाशमी

शामिल था ये सितम भी किसी के निसाब में

अदीम हाशमी

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