यात्रा Poetry (page 16)

कल गए थे तुम जिसे बीमार-ए-हिज्राँ छोड़ कर

ज़ौक़

दिखला न ख़ाल-ए-नाफ़ तू ऐ गुल-बदन मुझे

ज़ौक़

मुझे भी लम्हा-ए-हिजरत ने कर दिया तक़्सीम

शहपर रसूल

कहूँ मैं क्या कि क्या दर्द-ए-निहाँ है

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

निकले कभी न घर से मगर इस के बावजूद

शीन काफ़ निज़ाम

पाँव में दूर का सफ़र चमके

शीन काफ़ निज़ाम

मेरे अल्फ़ाज़ में असर रख दे

शीन काफ़ निज़ाम

मौज-ए-हवा तो अब के अजब काम कर गई

शीन काफ़ निज़ाम

इक साएँ साएँ घेरे है गिरते मकान को

शीन काफ़ निज़ाम

यही सफ़र की तमन्ना यही थकन की पुकार

शाज़ तमकनत

जाने वाले तुझे कब देख सकूँ बार-ए-दिगर

शाज़ तमकनत

आबला-पाई से वीराना महक जाता है

शाज़ तमकनत

ज़ख़्म सीने का फिर उभर आया

शायान क़ुरैशी

वक़्त आख़िर ले गया वो शोख़ियाँ वो बाँकपन

शायान क़ुरैशी

शाम के ढलते सूरज ने ये बात मुझे समझाई है

शायान क़ुरैशी

सफ़र कहने को जारी है मगर अज़्म-ए-सफ़र ग़ाएब

शायान क़ुरैशी

राह-ए-वफ़ा में साया-ए-दीवार-ओ-दर भी है

शायान क़ुरैशी

मंज़िल है कठिन कम ज़ाद-ए-सफ़र मालूम नहीं क्या होना है

शौक़ बहराइची

हो राहज़न की हिदायत कि राहबर के फ़रेब

शौकत थानवी

हवाएँ रोक न पाईं भँवर डुबो न सके

शौकत परदेसी

ज़िंदगी का सफ़र ख़त्म होता रहा तुम मुझे दम-ब-दम याद आते रहे

शौकत परदेसी

एक आसेब का साया था जो सर से उतरा

शौकत काज़मी

ये रात कितनी भयानक है बाम-ओ-दर के लिए

शातिर हकीमी

काट कर जो राह का बूढ़ा शजर ले जाएगा

शर्मा तासीर

नज़र भर देख लूँ बस

शारिक़ कैफ़ी

ख़ाक को मैं ख़्वार क्यूँ करता

शारिक़ कैफ़ी

सूना आँगन नींद में ऐसे चौंक उठा है

शारिक़ कैफ़ी

नहीं मैं हौसला तो कर रहा था

शारिक़ कैफ़ी

कभी ख़ुद को छूकर नहीं देखता हूँ

शारिक़ कैफ़ी

आइने का साथ प्यारा था कभी

शारिक़ कैफ़ी

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