रात Poetry (page 29)

न दिल अपना न ग़म अपना न कोई ग़म-गुसार अपना

शाद अज़ीमाबादी

किस पे क़ाबू जो तुझी पे नहीं क़ाबू अपना

शाद अज़ीमाबादी

काबा ओ दैर में जल्वा नहीं यकसाँ उन का

शाद अज़ीमाबादी

जिए जाएँगे हम भी लब पे दम जब तक नहीं आता

शाद अज़ीमाबादी

अब इंतिहा का तिरे ज़िक्र में असर आया

शाद अज़ीमाबादी

तुम से रुख़्सत-तलब है मिल जाओ

शबनम शकील

सिमट न पाए कि हर-सू बिखर गए थे हम

शबनम शकील

मिल बैठने के सारे क़रीनों की ख़ैर हो

शबनम शकील

दोस्तों का ज़िक्र क्या दुश्मन हैं जब बदले हुए

शबनम शकील

अक्सर अपने दर-पए-आज़ार हो जाते हैं हम

शबनम शकील

तमाम उम्र की आवारगी पे भारी है

शबनम रूमानी

ख़्वाब देखूँ कि रतजगे देखूँ

शबनम रूमानी

नज़्म

शबनम अशाई

नींद से आँख वो मिल कर जागे

शायर लखनवी

नफ़स नफ़स पे नया सोज़-ए-आगही रखना

शायर लखनवी

ख़्वाब से आँख वो मल कर जागे

शायर लखनवी

जुदा हो कर वो हम से है जुदा क्या

शायर लखनवी

उम्मीद के उफ़ुक़ से न उट्ठा ग़ुबार तक

शानुल हक़ हक़्क़ी

मोहब्बत ख़ार-ए-दामन बन के रुस्वा हो गई आख़िर

शानुल हक़ हक़्क़ी

ऐ दिल अब और कोई क़िस्सा-ए-दुनिया न सुना

शानुल हक़ हक़्क़ी

वक़्त ने इक नज़र जो डाली है

सीमान नवेद

जो अपने घर को का'बा मानते हैं

सीमाब ज़फ़र

फ़िराक़-मौसम के आसमाँ में उजाड़ तारे जुड़े हुए हैं

सीमाब ज़फ़र

रस्मन ही उन को नाला-ए-दिल की ख़बर तो हो

सीमाब अकबराबादी

न वो फ़रियाद का मतलब न मंशा-ए-फ़ुग़ाँ समझे

सीमाब अकबराबादी

खो कर तिरी गली में दिल-ए-बे-ख़बर को मैं

सीमाब अकबराबादी

अब ऐ बे-दर्द क्या इस के लिए इरशाद होता है

सीमाब अकबराबादी

आ अपने दिल में मेरी तमन्ना लिए हुए

सीमाब अकबराबादी

नक़्श आँखों में उतारा जाएगा

सीमा शर्मा मेरठी

बताओ मौत क्या है ज़िंदगी क्या

सीमा शर्मा मेरठी

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