रात Poetry (page 94)

जो चीज़ थी कमरे में वो बे-रब्त पड़ी थी

आदिल मंसूरी

दूर उफ़ुक़ के पार से आवाज़ के पर्वरदिगार

आदिल मंसूरी

बिस्मिल के तड़पने की अदाओं में नशा था

आदिल मंसूरी

अर्सा-ए-माह-ओ-साल से गुज़रे

आदिल फ़रीदी

कोई पत्थर कोई गुहर क्यूँ है

अदीम हाशमी

जब बयाँ करोगे तुम हम बयाँ में निकलेंगे

अदीम हाशमी

वो पौ फटी वो किरन से किरन में आग लगी

अदीब सहारनपुरी

किस की ख़ल्वत से निखर कर सुब्ह-दम आती है धूप

अदीब ख़लवत

क्यूँ

अदा जाफ़री

ये हुक्म है तिरी राहों में दूसरा न मिले

अदा जाफ़री

वो लम्हा कि ख़ामोशी-ए-शब नग़्मा-सरा थी

अदा जाफ़री

वैसे ही ख़याल आ गया है

अदा जाफ़री

रोज़-ओ-शब की कोई सूरत तो बना कर रख्खूँ

अदा जाफ़री

न बाम-ओ-दश्त न दरिया न कोहसार मिले

अदा जाफ़री

कोई संग-ए-रह भी चमक उठा तो सितारा-ए-सहरी कहा

अदा जाफ़री

चाक-ए-दिल भी कभी सिलते होंगे

अदा जाफ़री

नई सुब्ह चाहते हैं नई शाम चाहते हैं

अबुल मुजाहिद ज़ाहिद

अगर मेरी जबीन-ए-शौक़ वक़्फ़-ए-बंदगी होती

अबु मोहम्मद वासिल

काम हर ज़ख़्म ने मरहम का किया हो जैसे

अबु मोहम्मद सहर

यार रूठा है हम सें मनता नहिं

आबरू शाह मुबारक

देखो तो जान तुम कूँ मनाते हैं कब सेती

आबरू शाह मुबारक

क्या क्या धरे अजूबे हैं शहर-ए-ख़याल में

अबरार हामिद

दिए की लौ से न जल जाए तीरगी शब की

अबरार हामिद

तन्हा उदास शब के सिवा कोई भी न था

अबरार आज़मी

बहुत तज़्किरा दास्तानों में था

अबरार आज़मी

तिरी दुनिया के नक़्शे में

अबरार अहमद

पस-मंज़र की आवाज़

अबरार अहमद

मिट्टी थी किस जगह की

अबरार अहमद

हवा हर इक सम्त बह रही है

अबरार अहमद

ये रह-ए-इश्क़ है इस राह पे गर जाएगा तू

अबरार अहमद

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