शबनम Poetry (page 4)

क़ुल्ज़ुम-ए-उल्फ़त में वो तूफ़ान का आलम हुआ

शेर सिंह नाज़ देहलवी

यूँ अपने दिल के बोझ को कुछ कम किया गया

शहज़ाद रज़ा लम्स

आब ओ गिल

शाज़ तमकनत

मिसाल-ए-शोला-ओ-शबनम रहा है आँखों में

शाज़ तमकनत

हज़ारों मुश्किलें हैं और लाखों ग़म लिए हैं हम

शायान क़ुरैशी

न दे साक़ी मुझे कुछ ग़म नहीं है

शौक़ बहराइची

याद

शौकत परदेसी

रात शहर और उस के बच्चे

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

ये अर्ज़-ओ-समा क़ुलज़ुम-ओ-सहरा मुतहर्रिक

शम्स रम्ज़ी

खंडर

शमीम करहानी

ये ख़ुशी ग़म-ए-ज़माना का शिकार हो न जाए

शमीम करहानी

वो दिल भी जलाते हैं रख देते हैं मरहम भी

शमीम करहानी

पी कर भी तबीअत में तल्ख़ी है गिरानी है

शमीम करहानी

सफ़र नसीब अगर हो तो ये बदन क्यूँ है

शमीम हनफ़ी

तिरे बग़ैर अजब बज़्म-ए-दिल का आलम है

शकील बदायुनी

रुख़्सार आज धो कर शबनम ने पंखुड़ी के

शकेब जलाली

एक दरख़्त

शहज़ाद अहमद

रात जुदाई की रात

शहरयार

जिस को चाहा था न पाया जो न चाहा था मिला

शाहिद इश्क़ी

जिस को चाहा था न पाया जो न चाहा था मिला

शाहिद इश्क़ी

ए'तिराफ़

शाहिद अख़्तर

चाँद माँगा न कभी हम ने सितारे माँगे

शाहिद अख़्तर

तलाश

शहाब जाफ़री

चमन में देखते ही पड़ गई कुछ ओस ग़ुंचों पर

शाह नसीर

ज़ुल्फ़ का क्या उस की चटका लग गया

शाह नसीर

सुब्ह-ए-गुलशन में हो गर वो गुल-ए-ख़ंदाँ पैदा

शाह नसीर

सदा है इस आह-ओ-चश्म-ए-तर से फ़लक पे बिजली ज़मीं पे बाराँ

शाह नसीर

दिखा दो गर माँग अपनी शब को तो हश्र बरपा हो कहकशाँ पर

शाह नसीर

छोड़ा न तुझे ने राम क्या ये भी न हुआ वो भी न हुआ

शाह नसीर

मौसम-ए-गुल आ गया फिर दश्त-पैमाई रहे

शाग़िल क़ादरी

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