शाम Poetry (page 53)

मिरी ज़िंदगी किसी मोड़ पर कभी आँसुओं से वफ़ा न दे

अतीक़ अंज़र

जुदाई हद से बढ़ी तो विसाल हो ही गया

अतीक़ इलाहाबादी

चंद लम्हों को सही था साथ में रहना बहुत

अतीक़ इलाहाबादी

तिलिस्म-ए-शब से बहुत बे-ख़बर चले आए

अताउर्रहमान क़ाज़ी

शोहरत-ए-फ़न बहुत हुई दाद कमाल दे गए

अताउर्रहमान जमील

यक लम्हा सही उम्र का अरमान ही रह जाए

अता शाद

गहरी है शब की आँच कि ज़ंजीर-ए-दर कटे

अता शाद

तीरगी शम्अ बनी राहगुज़र में आई

अता आबिदी

ज़हराब-ए-हुस्न

असरार-उल-हक़ मजाज़

पर्दा और इस्मत

असरार-उल-हक़ मजाज़

नज़्र-ए-अलीगढ़

असरार-उल-हक़ मजाज़

लखनऊ

असरार-उल-हक़ मजाज़

ख़ाना-ब-दोश

असरार-उल-हक़ मजाज़

एक जिला-वतन की वापसी

असरार-उल-हक़ मजाज़

एक दोस्त की ख़ुश-मज़ाक़ी पर

असरार-उल-हक़ मजाज़

कैसे रफ़ू हों चाक-ए-गरेबाँ मैं भी सोचूँ तू भी सोच

असरारुल हक़ असरार

बिजली हुई फ़ेल

असरार जामई

बे-सबब ख़ौफ़ से दिल मेरा लरज़ता क्यूँ है

असरा रिज़वी

न मलाल-ए-हिज्र न मुंतज़िर हैं हवा-ए-शाम-ए-विसाल के

असलम महमूद

ग़म की सौग़ात है ख़मोशी है

असलम कोलसरी

आरज़ू-ए-दवाम करता हूँ

असलम कोलसरी

दोस्ती को आम करना चाहता है

असलम हबीब

ये हिकायत तमाम को पहुँची

असलम फ़र्रुख़ी

अब रात आ रही है

असलम इमादी

हमारी याद उन्हें आ गई तो क्या होगा

असलम आज़ाद

अजीब शख़्स है मुझ को तो वो दिवाना लगे

असलम आज़ाद

फ़क़त हर्फ़-ए-तमन्ना क्या है

असलम अंसारी

जब हमें इज़्न तमाशा होगा

असलम अंसारी

ज़ख़्म खा के भी मुस्कुराते हैं

आसिमा ताहिर

ये मो'जिज़ा भी किसी रोज़ कर ही जाना है

अासिफ़ शफ़ी

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