शाम Poetry (page 55)

वो एक नाम जो दरिया भी है किनारा भी

असअ'द बदायुनी

सैल-ए-गिर्या का सीने से रिश्ता बहुत

असअ'द बदायुनी

रास्ता कोई सफ़र कोई मसाफ़त कोई

असअ'द बदायुनी

मिरे शजर तुझे मौसम नया बनाते रहें

असअ'द बदायुनी

वो पलट के जल्द न आएँगे ये अयाँ है तर्ज़-ए-ख़िराम से

आरज़ू लखनवी

हर इक शाम कहती है फिर सुब्ह होगी

आरज़ू लखनवी

न कोई जल्वती न कोई ख़ल्वती न कोई ख़ास था न कोई आम था

आरज़ू लखनवी

ख़ाली बैठे क्यूँ दिन काटें आओ रे जी इक काम करें

आरज़ू लखनवी

जो दिल साथ छुटने से घबरा रहा है

आरज़ू लखनवी

जितना था सरगर्म-ए-कार उतना ही दिल नाकाम था

आरज़ू लखनवी

उफ़ुक़ के ख़ूनीं धुँदलकों का सुब्ह नाम नहीं

अर्शी भोपाली

न पयाम चाहते हैं न कलाम चाहते हैं

अरशद सिद्दीक़ी

ग़ुरूब-ए-शाम तो दिन भर के फ़ासले पर है

अरशद मलिक

लहू के साथ तबीअत में सनसनाती फिरे

अरशद मलिक

फ़िक्र सोई है सर-ए-शाम जगा दी जाए

अरशद कमाल

कहाँ कहाँ से सुनाऊँ तुम्हें फ़साना-ए-शब

अरशद जमाल 'सारिम'

सोते हैं फैल फैल के सारे पलंग पर

अरशद अली ख़ान क़लक़

मैं अपने आप को भी देखने से क़ासिर हूँ

अरशद अब्दुल हमीद

सुख़न के चाक में पिन्हाँ तुम्हारी चाहत है

अरशद अब्दुल हमीद

रुकते हुए क़दमों का चलन मेरे लिए है

अरशद अब्दुल हमीद

मिरे ख़ेमे ख़स्ता-हाल में हैं मिरे रस्ते धुँद के जाल में हैं

अरशद अब्दुल हमीद

फ़सील-ए-सब्र में रौज़न बनाना चाहती है

अरशद अब्दुल हमीद

चिराग़-ए-दर्द कि शम-ए-तरब पुकारती है

अरशद अब्दुल हमीद

मैं आलम-ए-इम्काँ में जिसे ढूँढ रहा हूँ

अर्श सिद्दीक़ी

आँखों में कहीं उस के भी तूफ़ाँ तो नहीं था

अर्श सिद्दीक़ी

दिल-ए-बेताब को बहलाने चले आए हैं

अर्श सहबाई

मेरे प्यारे वतन

अर्श मलसियानी

दीवाली

अर्श मलसियानी

निगाह-ए-तिश्ना से हैरत का बाब देखते हैं

अरमान नज्मी

न हर्फ़-ए-शौक़ न तर्ज़-ए-बयाँ से आती है

अरमान नज्मी

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