संग Poetry (page 6)

अपने सीने को मिरे ज़ख़्मों से भरने वाली

सिद्दीक़ मुजीबी

शहर-ए-एहसास में ज़ख़्मों के ख़रीदार बहुत

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

आ रही थी बंद कलियों के चटकने की सदा

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

रात का तारीक-तर पत्थर जिगर पानी करें

शोएब निज़ाम

मिल गया जब वो नगीं फिर ख़ूबी-ए-तक़दीर से

शोएब निज़ाम

नाज़ भला किस बात का तुझ को पास-ए-हुनर जब कुछ भी नहीं

शमशाद शाद

मुस्लिम-लीग

शिबली नोमानी

दियत इस क़ातिल-ए-बे-रहम से क्या लीजिएगा

शेर मोहम्मद ख़ाँ ईमान

नदी किनारे जो नग़्मा-सरा मलंग हुए

शेर अफ़ज़ल जाफ़री

उस संग-ए-आस्ताँ पे जबीन-ए-नियाज़ है

ज़ौक़

नहीं सबात बुलंदी-ए-इज्ज़-ओ-शाँ के लिए

ज़ौक़

क्या ग़रज़ लाख ख़ुदाई में हों दौलत वाले

ज़ौक़

कोई इन तंग-दहानों से मोहब्बत न करे

ज़ौक़

जब चला वो मुझ को बिस्मिल ख़ूँ में ग़लताँ छोड़ कर

ज़ौक़

इक सदमा दर्द-ए-दिल से मिरी जान पर तो है

ज़ौक़

दिल बचे क्यूँकर बुतों की चश्म-ए-शोख़-ओ-शंग से

ज़ौक़

बज़्म में ज़िक्र मिरा लब पे वो लाए तो सही

ज़ौक़

बुतो ये शीशा-ए-दिल तोड़ दो ख़ुदा के लिए

शैख़ अली बख़्श बीमार

वहशत तो संग-ओ-ख़िश्त की तरतीब ले गई

शीन काफ़ निज़ाम

पुरखों से जो मिली है वो दौलत भी ले न जाए

शीन काफ़ निज़ाम

क़ैद-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म

शाज़ तमकनत

वो गदा-गरान-ए-जल्वा सर-ए-रहगुज़ार चुप थे

शाज़ तमकनत

सोज़-ए-दुआ से साज़-ए-असर कौन ले गया

शाज़ तमकनत

शब ओ रोज़ जैसे ठहर गए कोई नाज़ है न नियाज़ है

शाज़ तमकनत

क्या करूँ रंज गवारा न ख़ुशी रास मुझे

शाज़ तमकनत

बना हुस्न-ए-तकल्लुम हुस्न-ए-ज़न आहिस्ता आहिस्ता

शाज़ तमकनत

हो राहज़न की हिदायत कि राहबर के फ़रेब

शौकत थानवी

क़ुदरत है तुर्फ़ा-कार तुझे कुछ ख़बर भी है

शारिक़ ईरायानी

हमारे सर हर इक इल्ज़ाम धर भी सकता है

शारिब मौरान्वी

बैत-ए-अंकबूत

शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी

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